पूरी दुनिया में जहां महिलाओं पर होने वाली हिंसा के मामले बढ़े हैं, वहीं राजधानी दिल्ली की महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने कहा है कि राजधानी में महिलाओं पर होने वाली हिंसा में कमी आई है।
मेरा हक फाउंडेशन की चेयरपर्सन फरहत नकवी कहती हैं कि उनके पास भी घरेलू हिंसा के कई मामले आये हैं, लेकिन उनकी कोशिश आपसी बातचीत से समस्या को सुलझाने की रही है और यह काफी कारगर साबित हो रही है।
उन्होंने कहा कि पुरुषों को अपने रोजगार की चिंता सता रही है और मध्यम वर्ग के पास आय का कोई साधन नहीं बचा है। शर्मिंदगी के कारण वे किसी से मदद लेने में भी संकोच कर रहे हैं। यही कारण है कि यह तनाव घरेलू हिंसा के रुप में सामने आ रहा है।
महिला अधिकारों के लिए काम कर रही अंबर जैदी कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि केवल पति या पत्नी ही एक-दूसरे के खिलाफ हिंसा कर रहे हैं। उनके सामने ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें परिवार के अन्य सदस्य जैसे जेठ, ससुर या बड़ा भाई अपने परिवार के छोटे सदस्यों और महिलाओं पर हिंसा कर रहे हैं। इससे बचने की जरूरत है।
संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने इसी माह कई बार ट्वीट कर महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा की तरफ लोगों का ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि शांति का मतलब केवल युद्ध के न होने की स्थिति नहीं है, यह घरेलू वातावरण में महिलाओं और बच्चों के प्रति हिंसा न होने से भी है।
उन्होंने दुनिया की विभिन्न सरकारों से अपील कर महिलाओं और बच्चों को घरेलू हिंसा से बचाने की अपील की।
सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉक्टर राजीव मेहता कहते हैं कि सामान्य तौर पर मनुष्य का स्वभाव खुद को दूसरों के मुताबिक ढालने की बजाय दूसरों को अपने मुताबिक बदलने की कोशिश होती है।
जब घर में पति-पत्नी लगातार एक-दूसरे के सामने हैं, तो ऐसे में छोटी-छोटी कमियां बड़ी दिखने लगती हैं। ऐसे में घर का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। नौकरियों पर संकट ने तनाव बढ़ाने का काम किया है जो तरह-तरह की हिंसा को बढ़ावा दे रहा है।
डॉक्टर राजीव मेहता के मुताबिक इससे बचने का सबसे बेहतर रास्ता यही हो सकता है कि हम दूसरे की कमी को देखने की बजाय अपने कामकाज में खुद को व्यस्त रखें।