राम मंदिर के लिए तराशे गए पत्थर(फाइल फोटो)
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60-70 के दशक में केरल सरकार ने दो भूमि सुधार कानून बनाए थे, जिनकी मदद से सरकार मंदिर और मठों के मैनेजमेंट पर कई सारी पाबंदियां लगाने की कोशिश कर रही थी। केशवानंद भारती ने सरकार की इन कोशिशों को अदालत में चुनौती दी थी और 68 दिन की सुनवाई के बाद इस केस में फैसला आया था।
मठ और केशवानंद भारती का इतिहास
केरल का सबसे उत्तरी जिला है- कासरगोड़। पश्चिम में समुद्र और पूर्व में कर्नाटक से घिरे इस इलाके का सदियों पुराना एक शैव मठ है जो एडनीर में स्थित है। नौवीं सदी के महान संत आदिगुरु शंकराचार्य के चार शुरुआती शिष्यों में से एक तोतकाचार्य की परंपरा में यह मठ स्थापित हुआ था, जिसका इतिहास 1,200 साल पुराना माना जाता है। यही कारण है कि केरल और कर्नाटक में इसका काफी सम्मान है।
शंकराचार्य की क्षेत्रीय पीठ का दर्जा प्राप्त होने के चलते इस मठ के प्रमुख को 'केरल के शंकराचार्य' का दर्जा दिया जाता है। ऐसे में स्वामी केशवानंद भारती केरल के मौजूदा शंकराचार्य कहे जाते हैं। उन्होंने महज 19 साल की अवस्था में संन्यास लिया था, जिसके कुछ ही साल बाद अपने गुरू के निधन की वजह से वे एडनीर मठ के मुखिया बन गए थे।
60-70 के दशक में इस एडनीर मठ के पास हजारों एकड़ जमीन थी। इस दशक के दौरान ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में केरल की तत्कालीन वामपंथी सरकार भूमि सुधार के लिए काफी प्रयास कर रही थी। समाज से आर्थिक गैर-बराबरी कम करने को लेकर सरकार ने कई भूमि सुधार कानून बनाए, जिनके तहत जमींदारों और मठों की हजारों एकड़ जमीनों का अधिग्रहण कर लिया।
इस कानून के तहत एडनीर मठ की सैकड़ों एकड़ जमीनें भी सरकार की हो गई। केशवानंद भारती, सरकार के विरोध में अदालत चले गए। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 26 का हवाला दिया, जो कि भारत के हर नागरिक को धर्म-कर्म के लिए संस्था बनाने, उनका प्रबंधन करने और इस सिलसिले में चल और अचल संपत्ति जोड़ने का अधिकार देता है। केशवानंद भारती का कहना था कि सरकार का बनाया कानून उनके संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है।
केशवानंद ने संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 31 में प्रदत्त संपत्ति के मूल अधिकार पर पाबंदी लगाने वाले केंद्र सरकार के 24वें, 25वें और 29वें संविधान संशोधनों को चुनौती दी थी। इसके अलावा केरल और केंद्र सरकार के भूमि सुधार कानूनों को भी उन्होंने चुनौती दी।
कहा जाता है कि स्वामी केशवानंद भारती के प्रतिनिधियों को संवैधानिक मामलों के मशहूर वकील नानी पालकीवाला ने सलाह दी थी। केशवानंद ने संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 31 में प्रदत्त संपत्ति के मूल अधिकार पर पाबंदी लगाने वाले केंद्र सरकार के 24वें, 25वें और 29वें संविधान संशोधनों को चुनौती दी थी।
इसके अलावा केरल और केंद्र सरकार के भूमि सुधार कानूनों को भी उन्होंने चुनौती दी। पालकीवाला की सलाह थी कि ऐसा करने से मठ को उसका हक दिलाया जा सकता है, लेकिन केरल हाईकोर्ट में मठ को कामयाबी नहीं मिली। आखिरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया।
हाईकोर्ट के फैसले से निराश केशवानंद सुप्रीम कोर्ट गए। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस की सुनवाई के दौरान पाया कि इस मामले से कई संवैधानिक सवाल जुड़े हैं। उनमें एक बड़ा सवाल यही था कि क्या देश की संसद के पास संविधान संशोधन के जरिए मौलिक अधिकारों में या अन्य किसी भी हिस्से में असीमित संशोधन का अधिकार है!
सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि 11 जजों की संविधान पीठ से भी बड़ी पीठ बनाई जाए। इसके बाद 31 अक्टूबर 1972 से शुरू हुई सुनवाई 23 मार्च 1973 तक चली थी। कुल 68 दिनों तक हुई सुनवाई के बाद अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने 703 पन्नों में अपना फैसला सुनाया। 13 जजों की पीठ में केवल एक वोट के अंतर से फैसला तय हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि
संविधान का बुनियादी ढांचा नहीं बदला जा सकता है। संसद में संशोधन से भी बुनियादी ढांचा नहीं बदला जा सकता।
संविधान का सबसे ऊपर होना, कानून का शासन, न्यायपालिका की आजादी, संघ और राज्य की शक्तियों का बंटवारा, धर्मनिरपेक्षता, संप्रभुता, गणतंत्रीय ढांचा, सरकार का संसदीय तंत्र, निष्पक्ष चुनाव आदि संविधान के बुनियादी ढांचे के अंतर्गत आते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से संसद और न्यायपालिका के बीच वह संतुलन कायम हो सका। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया वह आज भी मिसाल है।