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अध्ययन: उदासी और असंतुष्टि की ओर ले जाता है अकेलापन, सर्वे में दावा; ऐसे लोग होते है कम मिलनसार व कम जिम्मेदार

Sun, 29 Dec 2024 05:02 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

शोध की मुख्य लेखक जूलिया स्टर्न ने कहा, बढ़ती उम्र में लोग अक्सर सेहत और आर्थिक परेशानियों का सामना करते हैं। इस वक्त जीवनसाथी मददगार साबित हो सकता है। वहीं, अकेले रहने वालों को बुढ़ापे में स्वास्थ्य और वित्त संबंधी परेशानियां में साथ देने वाला कोई नहीं मिलता।
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अकेलापन (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Meta AI
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विस्तार
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ताउम्र अकेले रहने वाले लोग जिंदगी से बेजार हो सकते हैं। उन्हें जिंदगी में संतुष्टि का एहसास भी कम होता है। यह खुलासा जर्मनी के ब्रेमेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के साइकोलॉजिकल साइंस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में हुआ है।
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शोधकर्ताओं का दावा
अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 27 यूरोपीय देशों में 50 साल या उससे अधिक उम्र के 77,000 से अधिक लोगों का सर्वेक्षण किया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, जो लोग कभी भी लंबे वक्त के संजीदगी भरे रिश्ते में नहीं रहे हों, वे कम मिलनसार, कम जिम्मेदार, कम खुले विचारों वाले और नई चीजें अपनाने में कम दिलचस्पी रखते हैं। वहीं, रिश्तों में रहने वाले लोग इन मामलों में बेहतर होते हैं। 

मददगार की जरूरत
ब्रेमेन विश्वविद्यालय में वरिष्ठ शोधकर्ता और शोध की मुख्य लेखक जूलिया स्टर्न ने कहा, बढ़ती उम्र में लोग अक्सर सेहत और आर्थिक परेशानियों का सामना करते हैं। इस वक्त जीवनसाथी मददगार साबित हो सकता है। वहीं, अकेले रहने वालों को बुढ़ापे में स्वास्थ्य और वित्त संबंधी परेशानियां में साथ देने वाला कोई नहीं मिलता। जूलिया सुझाव देती हैं कि ऐसे लोगों के लिए मददगार नेटवर्क की बेहद जरूरत होती है।
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रिश्ते में रहे लोगों की अलग होती शख्सियत 
पहले के अध्ययनों ने अकेले रहने को अलग-अलग तरीकों से परिभाषित किया है। कुछ केवल वर्तमान वैवाहिक स्थिति देखते हैं, जबकि अन्य यह देखते हैं कि क्या व्यक्ति ने कभी शादी की या साथी के साथ रहा। शोधकर्ताओं के मुताबिक, जो लोग अतीत में संजीदगी से रिश्ते में रहे हैं, भले ही वह खत्म हो गया हो, उनकी शख्सियत की खासियतें उन लोगों से अलग होती हैं जो कभी किसी रिश्ते में नहीं रहे।

जरूरत है अधिक ख्याल रखने की
जूलिया स्टर्न के मुताबिक, जीवनभर अकेले रहने वाले लोगों को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे कार्यक्रम बनाए जाएं जो उनके व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर तैयार किए जाएं और उन्हें समान विचारधारा वाले लोगों से जोड़ें। यदि उनके पास कोई है जो उनकी नियमित रूप से देखभाल करता है या उनका ख्याल रखता है, तो यह बहुत मददगार हो सकता है।

जहां शादी की दर अधिक, वहां ऐसी स्थिति ज्यादा
जहां शादी को एक सामान्य सामाजिक मान्यता माना जाता है, वहां जिंदगीभर अकेले रहने वाले लोग अपनी जिंदगी से कम संतुष्ट हो सकते हैं। यह प्रवृत्ति उन देशों में अधिक है जहां शादी की दर ज्यादा है, जैसे दक्षिणी यूरोप।
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