केंद्र सरकार बनाएगी एडवाइजरी काउंसिल
केंद्र सरकार एक एडवाइजरी काउंसिल बनाएगी जो मेडिकल शिक्षा और ट्रेनिंग के बारे में राज्यों को अपनी समस्याएं और सुझाव रखने का मौका देगी। ये काउंसिल मेडिकल कमीशन को सुझाव देगी कि मेडिकल शिक्षा को कैसे सुलभ बनाया जाए।
इस कानून के आते ही पूरे भारत के मेडिकल संस्थानों में दाखिले के लिए सिर्फ एक परीक्षा ली जाएगी। इस परीक्षा का नाम NEET (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेस टेस्ट) रखा गया है।
खत्म हो जाएगी मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया
भारत में अबतक मेडिकल शिक्षा, मेडिकल संस्थानों और डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन से संबंधित काम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जिम्मेदारी थी लेकिन अगर ये विधेयक पारित होता है तो मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया खत्म हो जाएगी और उसकी जगह लेगा नेशनल मेडिकल कमीशन और इस बिल के पास होते ही देश में मेडिकल शिक्षा और मेडिकल सेवाओं से संबंधित सभी नीतियां बनाने की कमान इस कमीशन के हाथ में होगा।
एग्जिट टेस्ट देना होगा
इस बिल के पास होने के बाद अब एमबीबीएस पास करने के बाद प्रैक्टिस के लिए एग्जिट टेस्ट देना होगा। अभी नेशनल एक्जिट टेस्ट (नेक्स्ट) सिर्फ विदेश से मेडिकल पढ़कर आने वाले छात्र देते है।
बिल का विरोध कर रहे डॉक्टर
इधर, एनएमसी बिल से एम्स के रेजीडेंट डॉक्टर नाखुश हैं। पांच हजार डॉक्टर इस बिल के विरोध में एम्स के बाहर आज सुबह से विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि कोई छात्र एक बार एग्जिट परीक्षा नहीं दे पाया तो उसके पास दूसरा विकल्प नहीं है। इस बिल में कोई दूसरा विकल्प नहीं दिया गया है।
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री हर्षवर्धन ने सोमवार को लोकसभा में ‘राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग’ (एनएमसी) विधेयक को सबसे बड़ा सुधार करार दिया। यह आयोग 63 साल पुरानी भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) का स्थान लेगा। उन्होंने कहा कि विधेयक को लेकर आईएमए (भारतीय चिकित्सा संघ) की वास्तविक चिंताओं को दूर कर लिया गया है। सदन में विधेयक पेश कर स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि यह मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में चुनौतियों से निपटने के लिए नई व्यवस्था स्थापित करेगा।
हर्षवर्धन ने विधेयक को गरीबों के हित में बताते हुए कहा कि इससे न सिर्फ सरकारी बल्कि निजी कॉलेज में 50 फीसदी सीटें गरीब तबके के मेरिटधारी छात्रों की पहुंच में होंगी। उन्होंने कहा कि जब इतिहास लिखा जाएगा, तब यह विधेयक सबसे बड़े सुधार के रूप में दर्ज होगा। विधेयक पर चर्चा के दौरान कांग्रेस, द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने इसे अलोकतांत्रिक और संघीय ढांचे के खिलाफ बताया।
कांग्रेस के विंसेंट पाला ने कहा कि विधेयक एमसीआई को कमजोर कर अधिकतर नियंत्रण सरकार के हाथ में दे देगा। उन्होंने कहा कि इसमें विजन का अभाव है। विधेयक का समर्थन करते हुए भाजपा सांसद महेश शर्मा ने कहा कि भारतीय चिकित्सा परिषद एक्ट, 1956 लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रहा है। परिषद भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई है। नए विधेयक से इंस्पेक्टर राज का अंत होगा। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित बोर्ड में 26 सदस्यों में से 21 खुद डॉक्टर होंगे।
द्रमुक नेता ए राजा ने इसे गरीब विरोधी और सामाजिक न्याय के खिलाफ बताया। उन्होंने विधेयक में ‘एग्जिट परीक्षा’ के प्रस्ताव का विरोध कर कहा कि इससे छात्रों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा। तृणमूल कांग्रेस के सांसद काकोलि घोष दस्तीदार ने विधेयक को संघवाद के सिद्धांत के खिलाफ बताया।