मेनका की इच्छा राजनीतिक विरासत संभालें वरुण
ऐसे में राजनीतिक समझ यही बनती है कि मां ने बेटे का ख्याल रखते हुए उसके हित में इस बार सीट बदल ली। मेनका चाहती हैं कि बेटा पीलीभीत में उनकी विरासत संभाले, जिसकी वह 1989 से लेकर बच्चे की तरह देखभाल करती आई हैं, जबसे उन्होंने पहला चुनाव जीता था।
पहले एक बार यहां से सांसद रह चुके वरुण भी इस इलाके को अच्छी तरह से समझते हैं। अहम बात यह है कि मां को पूरा विश्वास है कि पीलीभीत से जीतना बेटे के लिए आसान रहेगा। सुल्तानपुर में संभावित चुनौतियों से जूझने के लिए खुद वह सुल्तानपुर शिफ्ट हो गईं।
मेनका गांधी के समर्थकों के मुताबिक उनके अंदर कांग्रेस के प्रत्याशी संजय सिंह से लड़ने की हिम्मत है। संजय सिंह शुरुआती दिनों में मेनका के पति संजय गांधी के करीबी थे।
बहुत से लोगों को हैरानी इस बात की है कि वरुण अपनी सीट बदलने के लिए तैयार कैसे हो गए? उनके पार्टी के नेतृत्व से रिश्ते कैसे हैं, यह बात छिपी नहीं है। और इसकी वजह भी यह मानी जाती है कि उन्हें मन में जो आए, वह कहने की आदत है और वह किसी का आदेश नहीं सुनते।
उनके करीबी सहयोगी, जिन्होंने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर बताया कि वरुण गांधी जिसके हकदार हैं, वह उन्हें कभी बीजेपी से नहीं मिला। इसलिए क्योंकि वह गांधी हैं। सोचिए, योग्य वरुण गांधी के नाम पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए विचार नहीं किया गया और यह पद भगवाधारी योगी आदित्यनाथ को चला गया।