प्रियंका गांधी आज कांग्रेस की महासचिव और भीड़ खींचने वाली नेता हैं। वह मां सोनिया गांधी की सीट रायबरेली में अक्सर नजर आती हैं। उनके भाषण सुर्खियां बटोरते हैं। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में प्रियंका को आगे लाकर अपनी मंशा साफ कर दी है। वो पार्टी के सबसे बड़े योद्धाओं में हैं और जंग है- 2019 के मैदान में।
लेकिन ठीक 20 साल पहले भी प्रियंका एक जंग में कूदी थीं। साल था 1999 और मैदान था- रायबरेली। अपने एक भाषण से उन्होंने सियासत का रुख बदल दिया। उस वक्त प्रियंका महज 27 साल की थीं और केंद्र में तब भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार थी। यह 1999 का दौर था और प्रियंका अपने पारिवारिक मित्र और कांग्रेस प्रत्याशी कैप्टन सतीश शर्मा के लिए प्रचार कर रहीं थीं। भारतीय जनता पार्टी ने प्रत्याशी के तौर पर मैदान में राजीव गांधी के चचेरे भाई अरुण नेहरू को उतारा था। अरुण नेहरू ने 1980 के दशक में हुए बोफोर्स विवाद के बाद वीपी सिंह के जन मोर्चा के लिए पार्टी छोड़ दी थी।
भारतीय जनता पार्टी को पूरा विश्वास था कि अरुण नेहरू, सतीश शर्मा को पटखनी देकर चुनाव जीत ले जाएंगे। पूरा माहौल भी बन चुका था। इसके पीछे एक वजह यह भी थी कि अरुण नेहरू पहले भी रायबरेली से चुनाव जीत चुके थे। लेकिन 27 साल की युवा प्रियंका ने भीड़ के सामने बस एक ही वाक्य कहा और रायबरेली की पूरी राजनीति बदल गई।
प्रियंका ने लोगों से कहा-
''क्या आप उस व्यक्ति के लिए वोट करेंगे जिसने मेरे पिता की पीठ में छुरा भोंका था।''
राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि प्रियंका गांधी की इस लाइन ने रायबरेली के पूरे राजनीतिक समीकरण को बदल के रख दिया था और इसकी बदौलत सतीश शर्मा के सिर पर जीत का मुकुट सज गया। उनके इस भाषण की खूब चर्चा हुई और दिल्ली तक बात पहुंची। प्रियंका गांधी के भाषण के अगले दिन अरुण नेहरू के प्रचार के लिए अटल बिहारी वाजपेयी आए लेकिन नेहरू जीत का स्वाद न चख सके।