यह तो बताने का तरीका था नहीं
आडवाणी के करीबी बताते हैं कि जिस तरह से गांधीनगर की सीट को लेकर पिछले एक साल से अंदरखाने में सबकुछ चल रहा था, वह आडवाणी को साल रहा था। आडवाणी करीब 92 साल के हो चुके हैं। शरीर से स्वस्थ हैं, लेकिन उम्र का असर है। इसलिए वह खुद बहुत भागम-भाग और चुनाव लड़ऩे के पक्ष में नहीं थे। उनके कार्यालय से संबंध रखने वाले सूत्र की मानें तो लालकृष्ण आडवाणी परिवार की राजनीति के सख्त खिलाफ हैं। वह अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी पुत्र जयंत को कदापि नहीं बना सकते, लेकिन बेटी प्रतिभा आडवाणी के बारे में यदि उन पर दबाव बनाया जाता तो सोच सकते थे।
फिर भी सूत्र का कहना है कि प्रतिभा को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने के लिए तैयार होते, इसमें संदेह है। इन सब स्थितियों के बावजूद आडवाणी उम्मीद करके चल रहे थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उनसे मिलकर गांधीनगर सीट के प्रत्याशी के बारे में चर्चा करेंगे। इस चर्चा के बाद ही पार्टी कोई निर्णय करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह आडवाणी के लिए तकलीफ की बात है कि पार्टी के संगठन मंत्री रामलाल ने लाल कृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी को जाकर इसकी सूचना दी।
....और फिर नहीं दिया आशीर्वाद
संगठन मंत्री राम लाल द्वारा गांधीनगर सीट से प्रत्याशी न बनाए जाने की सूचना मिलने के बाद आडवाणी जी को अच्छा नहीं लगा। उल्टे संगठन मंत्री चाहते थे कि आडवाणी लिखकर दे दें कि वह अधिक उम्र के कारण स्वेच्छा से गांधीनगर से लोकसभा चुनाव लड़के अनिच्छुक हैं। रामलाल ने यही आग्रह मुरली मनोहर जोशी से भी किया था। बताते हैं दोनों नेताओं ने रामलाल की यह बात नहीं मानी। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के दफ्तर आडवाणी का अनुकूल समय पूछा गया ताकि प्रधानमंत्री और शाह जाकर आडवाणी से मिल लें। गांधीनगर से नामांकन के पहले भाजपा अध्यक्ष पार्टी के वरिष्ठतम नेता का आशीर्वाद लें ले।
यह सांकेतिक ही सही, लेकिन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर अहमियत देने वाली भाजपा के लिए परंपरा के अनुरूप भी है। सूत्र बताते हैं कि आडवाणी इसके लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने नकारा भी नहीं और मिलने के समय की सूचना भी नहीं दी। समझा जा रहा है कि आडवाणी इस तरह की मुलाकात के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पा रहे थे। बताते हैं इसके बाद आडवाणी के कार्यालय को उम्मीद थी कि संभवत: समय मांगने के लिए अगला फोन आएगा, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो सका है।
आडवाणी और जोशी के लिए मुश्किल की घड़ी
संघ परिवार से आडवाणी के रिश्ते अब अच्छे नहीं हैं। डॉ. जोशी के हैं। डॉ. जोशी ने कुछ नेताओं से अपनी नाराजगी जताई और कानपुर के अपने मतदाताओं को पत्र भी लिखा कि पार्टी उन्हें चुनाव नहीं लड़ाना चाहती। आडवाणी को यह साहस नहीं हो रहा है। आडवाणी ने जीवन में भाजपा को संगठन, संगठन में नेता और भाजपा को सत्ता का रास्ता दिया है। सुषमा स्वराज, उमा भारती, उप राष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, पूर्व केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार जैसे तमाम दिग्गज नेता आडवाणी द्वारा तराशे गए हैं, लेकिन परिस्थितियां बदल चुकी हैं।
आडवाणी की दुविधा है कि जिस पार्टी को उन्होंने अपने पसीने से सींचा है, कैसे उसकी नई परंपराओं पर खरी-खरी सुना दें। आडवाणी के करीबी मानते हैं कि वह भीतर से कुपित हैं, उनके सीने में इसको लेकर दर्द है, बोझिल हैं, लेकिन आडवाणी अपने सिद्धांतों, जीवन में तय किए मूल्यों से बंधे हैं। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की मानें तो जब अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा की नाराजगी और छटपटाहट आडवाणी ने देखी तो उन्हें पीड़ा हुई, लेकिन फिर भी वह अपनी मर्यादाओं में रहे। कुछ यही विधा है जो उन्हें लाल कृष्ण आडवाणी बनाती है।