दोबारा अध्यक्ष नहीं बन सके जोशी
इसी तरह डॉ. मुरली मनोहर जोशी संघ की मदद से पार्टी के अध्यक्ष बन तो गए लेकिन दूसरा कार्यकाल नहीं ले पाए और न कभी फिर अध्यक्ष बन पाए। डॉ. जोशी को दूसरा कार्यकाल मिलने से रोकने के लिए आडवाणी, वाजपेयी के पास अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव लेकर गए थे। यह दीगर बात है कि वाजपेयी ने सिरे से मना कर दिया।
यह बात 1993 की है। उस समय वाजपेयी को हटाकर आडवाणी लोकसभा में विपक्ष के नेता बन चुके थे। उसके बाद उन्होंने 2002 में वाजपेयी को हटाकर प्रधानमंत्री बनने की कोशिश की ये तो ताजा इतिहास है। इत्तफाक है कि इस बार भी यह प्रस्ताव लेकर रज्जू भइया ही वाजपेयी के पास गए।
नरेंद्र मोदी आडवाणी के प्रिय पात्रों में थे। 2002 के गुजरात दंगे के बाद मोदी की कुर्सी बचाने में आडवाणी की सबसे अहम भूमिका थी। हालांकि, 2005 में आडवाणी को पार्टी से निकाले जाने से बचाने में मोदी की भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं थी।
इस सबके बावजूद जब मई 2013 में गोवा में मोदी को लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी की अभियान समिति का अध्यक्ष बनाने की बात आई तो आडवाणी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए। वे समझ रहे थे कि इसका अगला कदम प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी है। वे पार्टी के इस फैसले को रोकने के लिए गोवा कार्यकारिणी में गए ही नहीं। उन्हें लगा कि उनकी अनुपस्थिति में यह फैसला नहीं होगा।
उसके बाद जब पार्टी के संसदीय बोर्ड में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का प्रस्ताव आने वाला था तो वे आखिरी मिनट तक उसे रुकवाने की कोशिश करते रहे। उन्हें लगता था कि संसदीय बोर्ड में उनका बहुमत है।
एनडीए छोड़कर जाने की कगार पर खड़े नीतीश कुमार को उन्होंने संदेश भिजवाया कि हमारे पुराने अध्यक्ष (नितिन गडकरी) ने जो वादा किया था उस पर हम कायम हैं। संसदीय बोर्ड में हमारा बहुमत है और हम मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनने देंगे। उसके बाद जो हुआ वह बताने की जरूरत नहीं है।
आडवाणी से आशंकित पार्टी नेतृत्व
आडवाणी आज तक इस बात को स्वीकार नहीं कर पाए हैं। यही वजह है कि मोदी और अमित शाह आज भी आशंकित रहते हैं। शायद इसी अविश्वास या डर के कारण पार्टी नेतृत्व ने उन्हें कोई संवैधानिक पद नहीं दिया।
दो साल पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की अप्रत्याशित जीत हुई। नतीजों के बाद हुई पहली संसदीय दल की बैठक (उस समय संसद का बजट सत्र चल रहा था) में आडवाणी ने पार्टी के एक वरिष्ठ नेता से कहा कि वे आशीर्वाद देने के लिए कुछ बोलना चाहते हैं। उनसे उसी विनम्रता से कहा गया कि 'दादा आप यहीं से आशीर्वाद दे दीजिए। कुछ गड़बड़ हो गई तो समस्या हो जाएगी।'
आडवाणी ने अपने ब्ल़ॉग में जो लिखा है उस बात से कोई असहमत नहीं हो सकता। पर ऐसे समय जब पार्टी राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को लोकसभा चुनावों के विमर्श का केंद्र बनाना चाहती है, यह बयान नेतृत्व को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश नजर आता है। इसीलिए इसके असर को कम करने के लिए प्रधानमंत्री ने तुरंत ट्वीट करके कहा, 'आडवाणी जी ने भाजपा के मूल तत्व को सच्चे रूप में प्रस्तुत किया है।'
विडंबना देखिए कि आडवाणी को अपने उत्कर्ष के दिनों में कुछ ऐसा ही वाजपेयी से सुनना पड़ा था। फर्क यह है कि उस समय वाजपेयी आडवाणी की तरह अस्ताचल में नहीं गए थे।
बात 1990 की है जब आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा का फैसला किया। भोपाल में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की विस्तारित बैठक में इसका औपचारिक ऐलान हुआ। अधिवेशन के समापन भाषण में वाजपेयी ने आडवाणी की ओर देखते हुए कहा कि 'आडवाणी जी इस बात को याद रखिएगा कि आप अयोध्या जा रहे हैं, लंका नहीं।' आडवाणी के लोगों ने तब इसे वाजपेयी की कुंठा और हताशा के रूप में लिया था। आज इतिहास अपने को दोहरा रहा है।
सार्वजनिक जीवन में कई बार बात सही या गलत होने से ज्यादा यह अहम हो जाता है कि वह किस समय और किस मकसद से कही गई है।
आज सवाल आडवाणी जी की बात का नहीं, उनकी नीयत का है। इस स्थिति के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति को यह जरूर पता होना चाहिए कि कब दूसरों के लिए जगह खाली कर देनी है। क्योंकि कोई सम्मान देता नहीं, उसे अर्जित करना पड़ता है। आडवाणी ने पिछले कुछ सालों में सम्मान की अपनी अर्जित पूंजी गंवा दी है।
(प्रदीप सिंह)