लोकसभा चुनाव में वोटों की फसल काटने के लिए अब हर जरिया अपनाया जाने लगा है। पहले दारू का बोलबाला ज्यादा रहता था, लेकिन इस चुनाव में नशीले पदार्थों ने दारू, रुपया पैसा और सोना-चांदी सबको पीछे छोड़ दिया है। नशीले पदार्थों के सामने दूसरे साधनों की चमक फीकी पड़ गई है। चुनाव आयोग ने 26 मार्च से लेकर 22 अप्रैल तक 1169 करोड़ रुपये से ज्यादा के नशीले पदार्थ जब्त किए हैं।
इस अवधि में 937 करोड़ रुपये का सोना-चांदी, 730 करोड़ रुपये की नकदी और 234 करोड़ रुपये की शराब बरामद की गई है। लोकसभा चुनाव में सोना-चांदी और नकदी के इस्तेमाल में तमिलनाडु अव्वल है तो वहीं नशीले पदार्थों में गुजरात टॉप पर है। शराब के इस्तेमाल में उत्तर प्रदेश ने बाकी राज्यों को पछाड़ दिया है।
बता दें कि चुनावों के दौरान अधिकांश उम्मीदवार वोटरों को प्रभावित करने के लिए शराब, नकदी, सोना-चांदी और नशे का सहारा लेते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में 91.80 करोड़ रुपये के मूल्य की 6593586.64 लीटर शराब जब्त की गई थी। 303.86 करोड़ रुपये की नकदी और 804.59 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थ भी जब्त किए गए। गुजरात, बिहार, नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर का कुछ हिस्सा और लक्ष्यदीप आदि को छोड़ दें तो बाकी राज्यों में शराब पर प्रतिबंध नहीं है।
चुनाव आयोग के अधिकारी भी मानते हैं कि तमाम प्रयासों के बावजूद वे चुनाव में इस्तेमाल होने वाले नशीले पदार्थों, शराब और दूसरे अवैध साधनों की एक चौथाई मात्रा भी जब्त नहीं कर पाते हैं। इसमें कई तरह की दिक्कतें सामने आती हैं। विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों में तैनात चुनावी पर्यवेक्षक अमूमन दूसरे राज्यों से आते हैं, लेकिन बाकी स्टॉफ स्थानीय ही रहता है। ऐसे में सूचनाएं लीक हो जाती हैं।
दूसरा, नशीले पदार्थों का सामान्य चेकिंग में पकड़े जाना बहुत मुश्किल होता है। देखने में आया है कि नशीले पदार्थों को छोटे थैले या जेब में भी रखा जा सकता है। कई राज्यों में तो दुपहिया वाहनों के जरिए नशीले पदार्थों की सप्लाई होती है। गुजरात, पंजाब और दिल्ली में नशे की जो खेप पकड़ी गई है, वह खुफिया अलर्ट के आधार पर संभव हो सकी है।
चुनाव आयोग की टीमें दूसरी जांच एजेंसियों के साथ लगातार संपर्क में रहती हैं। बॉर्डर इलाकों में नशे का कारोबार ज्यादा रहता है, लेकिन वहां पर केवल चुनाव आयोग की टीमें उस पर नजर रख सकें, ऐसा नहीं हो पाता। सीमावर्ती इलाकों से ही दूसरे राज्यों में नशीले पदार्थ पहुंचाए जाते हैं। वहां लोकल प्रशासन पर अधिक निर्भरता रहती है।
शराब की पेटियां भी ऐसे वाहनों में इधर-उधर ले जाई जाती हैं, जिन पर किसी पार्टी का कोई चिन्ह या झंडा आदि नहीं लगा होता। चुनाव में इस्तेमाल हो रही बिना चिन्ह वाली गाड़ियां सामान्य ही नजर आती हैं, ऐसे में हर वाहन को रोक कर चेकिंग करना आयोग की टीमों के लिए संभव नहीं होता।