धनबाद की भूली बस्ती जिसे एशिया की सबसे बड़ी मजदूर बस्ती कहा जाता है, वहां रामबली से मुलाकात होती है। रामबली के मुताबिक भाजपा के पीएन सिंह की राह आसान है और कीर्ति आजाद बाहरी हैं और देर से चुनाव में उतरे हैं। भाजपा ओबीसी मोर्चे की जिला इकाई के अध्यक्ष कैलाश गुप्ता का भी यही कहना है।
लेकिन तस्वीर का एक दूसरा रुख यह भी है कि कीर्ति आजाद को अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और पूर्व क्रिकेटर के साथ साथ लंबे समय तक भाजपा में रहने का फायदा मिल रहा है। धनबाद में ब्राह्मणों की खासी तादाद है और लंबे समय बाद एक सजातीय उम्मीदवार मैदान में है। धनबाद के ही रहने वाले रवि झा कहते हैं कि कीर्ति की तरफ ब्राह्मणों का झुकाव बढ़ रहा है। साथ ही उनके साथ मुस्लिम, आदिवासी और ईसाई मतदाता भी हैं। इसलिए मुकाबला कांटे का है।
साथ ही धनबाद के प्रभावशाली परिवार सिंह मेशंस के मनीष सिंह उर्फ सिद्धार्थ गौतम निर्दलीय मैदान में हैं। मनीष के भाई संजीव सिंह झरिया से भाजपा विधायक हैं और इन दोनों का ताल्लुक एक जमाने में कोयले की सियासत के सबसे दबंग नाम सूरजदेव सिंह के परिवार से है। कीर्ति और उनके समर्थक इसे अपने लिए एक अवसर मान रहे हैं।कुल मिलाकर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
कुछ यही तस्वीर रांची की दिखती है जहां भाजपा के बागी पूर्व सांसद रामटहल चौधरी के निर्दलीय मैदान में होने से भाजपा के संजय सेठ की मुश्किल बढ़ गई है। सेठ का मुकबला कांग्रेस के सुबोधकांत सहाय से है जो पहले यहां सांसद रह चुके हैं और पिछली बार चुनाव हारने के बावजूद क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे हैं। जबकि संजय सेठ पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। सेठ के साथ भाजपा की ताकत और पूरे एनडीए का समर्थन है।
कुछ इसी तरह सहाय के साथ भी कांग्रेस के अलावा महागठबंधन के दलों की ताकत है।सेठ को भाजपा के परंपरागत जनाधार के साथ पंजाबी और वैश्य समुदाय के समर्थन का पूरा भरोसा है तो सुबोध को सजातीय कायस्थ बिरादरी के अलावा ईसाई, मुस्लिम,दलित और आदिवासियों से समर्थन मिलने की उम्मीद है।
भाजपा के बागी रामटहल चौधरी लगातार तीन बार यहां से लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। क्षेत्र की कुर्मी बिरादरी उनके पीछे एकजुट होने का दावा उनके समर्थक करते हैं। उम्र सीमा के चलते उनका टिकट काट दिया गया, लेकिन चौधरी के निर्दलीय मैदान में आने से मुकाबला तिकोना हो गया है।
हजारीबाग में जयंत सिन्हा के सामने किसी बागी उम्मीदवार की चुनौती नहीं है। जयंत 2014 में यहां से जीते थे, उसके पहले उनके पिता पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा सांसद रहे हैं। यशवंत सिन्हा भाजपा से बगावत कर चुके हैं और लगातार मोदी सरकार पर हमलावर हैं। जयंत के मुकाबले कांग्रेस के गोपाल साहू हैं जिनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी साहू बिरादरी की तादाद सबसे ज्यादा होना है। साथ ही मुस्लिम और ईसाई समुदाय के समर्थन का भी उन्हें पूरा भरोसा है।
लेकिन जयंत सिन्हा को झारखंड के इलाकाई दल आजसू का पूरा समर्थन है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल की चुनावी सभा में भाजपा की टोपी और स्कार्फ पहने विभन सिंह, अनुज तिवारी, बबलू मोदी और पिंटू चौधरी से बात होती है। चारों ही भाजपा के नहीं आजसू के कार्यकर्ता हैं।
विभन सिंह कहते हैं कि हालाकि जयंत सिन्हां ने क्षेत्र को उतना समय नहीं दिया जितना एक सांसद को देना चाहिए, लेकिन हम सब आजसू के कार्यकर्ता और समर्थक उनका पुरजोर समर्थन कर रहे हैं क्योंकि आजसू का भाजपा से गठबंधन है और हमे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पूरा भरोसा है।