देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कांग्रेस लड़खड़ा रही है। संजय निरुपम के अध्यक्षीय कार्यकाल में पार्टी में जबरदस्त बिखराव हुआ। ऐन चुनाव से ठीक पहले उन्हें हटा दिया गया। मुंबई के समर्पित कांग्रेसी निरुपम के दौर को याद भी नहीं रखना चाहते। उनकी जगह अध्यक्ष बने मिलिंद देवड़ा का कहना है कि पार्टी को मजबूत करने के काम अब लोकसभा चुनाव के बाद होंगे। यह चुनाव तो उम्मीदवारों को अपने ‘अनुभव’ के आधार पर लड़ना होगा।
संजय निरुपम की वेबसाइट (संजयनिरुपमडॉटकॉम) खोलें तो उनकी मुस्कुराती तस्वीर के साथ लिखा दिखेगा, अध्यक्ष-मुंबई कांग्रेस। तय है, निरुपम स्वीकार नहीं पाए हैं कि उन्हें मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है। हटाए जाने से वह इतने नाराज हैं कि 29 मार्च को जब मिलिंद देवड़ा उनकी जगह पदभार संभाल रहे थे तो निरुपम बीच कार्यक्रम से उठकर चले गए। जब मुंबई के लिए घोषणा पत्र जारी किया गया तो भी नहीं पहुंचे। बोले- युवाओं के लिए घोषणा पत्र बनाने और प्रचार में व्यस्त हैं। निरुपम उत्तर-पश्चिम मुंबई सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। सामने हैं शिवसेना के 75 वर्षीय मौजूदा सांसद गजानन कीर्तिकर।
बिखेर गए कांग्रेस को
निरुपम संसद में पहुंचने की राह तलाश रहे हैं, परंतु मुंबई कांग्रेस के अधिकतर सदस्य उनसे खफा हैं। वोट पड़ने में महज कुछ दिन बचे हैं और कांग्रेसी कह रहे हैं कि निरुपम की कार्यशैली से पार्टी बिखर गई है। दक्षिण मुंबई से उम्मीदवार और नए अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा भी रणनीति में देरी की बात कहकर पल्ला झाड़ चुके हैं। कहते हैं- चुनाव से बेमुश्किल 30 दिन पहले मुझे पद मिला। यह महीनों पहले होना था। उर्मिला मातोंडकर को छोड़ सभी उम्मीदवार अनुभवी हैं। वह अपने अनुभव के आधार पर लड़ें। निरुपम ने मार्च 2015 में अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी को जैसी आक्रामक धार देने की कोशिश की, वह पारंपरिक नेताओं को रास नहीं आई। निरुपम ‘डिक्टेटर’ हो गए। गुरुदास कामत और नारायण राणे जैसे सीनियर नेता उनसे नाराज और कार्यकर्ता दूर हो गए। 2017 के बीएमसी चुनावों में हार के बाद कई कांग्रेसी भाजपा-शिवसेना में शामिल हो गए।
मनमर्जियां व नाराजगियां
निरुपम 2005 में कांग्रेस में आने से पहले सोनिया गांधी के तीखे आलोचक थे। 2014 में मोदी लहर में कांग्रेस ने मुंबई की सभी छह सीटें गंवा दी तो निरुपम को मुंबई कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। इससे गुरुदास कामत और खफा हुए। मिलिंद देवड़ा की भी नजर पिता मुरली देवड़ा की विरासत पर थी, जो 22 साल अध्यक्ष रहे थे। निरुपम ने किसी की परवाह नहीं की। यहीं, जनार्दन चांदुरकर से पहले मुंबई के अध्यक्ष और उत्तर भारतीय चेहरे कृपाशंकर सिंह और पूर्व सांसद एकनाथ गायकवाड़ भी निरुपम के विरुद्ध हो गए।