फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ओसामा को 'जी' और हाफिज को 'साहब' क्यों कहते हैं दिग्विजय?

Wed, 06 Mar 2019 03:48 PM IST
ललित फुलारा ललित फुलारा, चुनाव डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
दिग्विजय सिंह भारतीय राजनीति का ऐसा चेहरा हैं जिनका विवादों से पुराना नाता रहा है।
विज्ञापन

दिग्विजय सिंह भारतीय राजनीति का ऐसा चेहरा हैं जिनका विवादों से पुराना नाता रहा है। साल 2013 में उन्होंने एक बयान दिया और भारत की धरती पर दहशत फैलाने वाले आतंकी सगंठन 'जमात-उद-दावा ' के मुखिया हाफिज सईद को 'साहब' कह डाला। उनके इस बयान की काफी आलोचना हुई। अब सवाल है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर क्यों चारों तरफ दिग्विजय..दिग्विजय हो रही है? इसका जवाब है- देश के दिल को चोटिल करने वाली, हर भारतीय के आंखों को आंसुओं और क्रोध से भरने वाली पुलवामा आतंकी हमले को 'दुर्घटना' बताना।

विज्ञापन


अब सवाल उठता है कि क्या दिग्विजय सिंह को 'दुर्घटना' और 'आतंकी घटना' का शाब्दिक अर्थ नहीं मालूम या फिर उनसे कोई चूक हुई है। या उनके ट्वीटर अकाउंट को हैंडल करने वाली टीम से यह गलती हुई है। हालांकि, इस बीच दिग्विजय पुलवामा आतंकी हमले को 'दुर्घटना' बताने वाले अपने बयान पर कायम हैं और उनका कहना है कि किसी की हिम्मत है तो उन पर केस करे। कांग्रेस इस मामले को जबरन तूल देने का आरोप लगा रही है। जबकि भाजपा के कई बड़े नेताओं से लेकर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे लेकर दिग्विजय पर हमलावर हो चुके हैं। ऐसा कतई नहीं है कि इस मामले में सिर्फ दिग्विजय सिंह की ही जुबान फिसली है, भारतीय जनता पार्टी के नेता और यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी पुलवामा हमले को बड़ी 'दुर्घटना' बता चुके हैं।


दुर्घटना और आतंकी हमले में क्या है अंतर?
दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक प्रकाश उप्रेती कहते हैं 'दुर्घटना' का अर्थ ऐसी घटना से होता है जो पूर्व नियोजित न हो। जिस घटना को कोई पूर्व आभास न हो। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले का हमें कोई पूर्व आभास नहीं था लेकिन आतंकियों ने इस घटना को योजनाबद्ध तरीके से और पूरी रणनीति के तहत अंजाम तक पहुंचाया था, इसलिए यह कोई 'दुर्घटना' नहीं बल्कि एक आतंकवादी घटना है। जिसका मकसद देश की संप्रभुता, एकता और लोकतांत्रिक ढाचे को नुकसान पहुंचाना और सेना के मनोबल को गिराना था। ऐसे में चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या फिर कांग्रेस राजनीति में शब्दों के चयन की शालीनता बनी रहनी चाहिए। 
विज्ञापन


दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी प्रोफेसर अजीत कुमार पुरी कहते हैं कि दुर्घटना प्रकृति जनित और और मानव जनित दोनों हो सकती है। दुर्घटना पर व्यक्ति का कोई बस नहीं चलता है। जबकि पुलवामा में हुआ आतंकी हमला सुनियोजित था। यह मानव सभ्यता पर बर्बर हमला था। इस आतंकी हमले का दुर्घटना के साथ तालमेल करना दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका कहना है कि आतंकी हमले को दुर्घटना बताना अमानवीय अाचरण है। यह आतंकवादी कृत्य को ढकने का प्रयास है। इससे यह संदेश जा रहा है कि ऐसे लोग आतंकवाद के समर्थन में खड़े हो रहे हैं।
 

विज्ञापन

भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने भी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयाब के सह-संस्थापक और मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को 'जी' बोला था।  - फोटो : ANI
दिग्विजय ही नहीं, रविशंकर प्रसाद भी तो हाफिज को बोल चुके हैं ये बात!
दरअसल, छह साल पहले जब दिग्विजय सिंह ने हाफिज को 'साहब' कहा था तो उस वक्त भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन का कहना था कि वे हाफिज को 'श्री' और 'श्रद्धेय' भी बोल सकते हैं। वैसे तो भारतीय राजनीति में जुबान फिसलने की परंपरा काफी पुरानी है और अमूमन हर पार्टी के नेताओं की जुंबा बचते-बचते फिसल ही जाती है और शब्द अपना अर्थ खो देते हैं। एक साल पहले की बात है भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने भी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयाब के सह-संस्थापक और मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को 'जी' बोला था। 

नेताओं की 'जी' और हांजी....
दिग्विजय सिंह अमेरिका को दहलाने वाले आतंकी ओसामा बिल लादेन को भी 'जी' बोल चुके हैं।  यह करीब आठ साल पुरानी बात है। उस वक्त दिग्विजय सिंह ने कहा था कि पाकिस्तान के मिलिट्री अकादमी से 100 गज दूर पर ओसामा जी कई वर्षों से रह रहे थे, पाकिस्तानी आर्मी और सरकार क्या कर रही थी इस पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि नेताओं की आदत में ही 'जी' और हांजी शुमार हो गया हो!

हिंदी में 'जी', 'साहब', 'श्री' और 'श्रद्धेय' का प्रयोग?
प्रकाश उप्रेती कहते हैं कि हिंदी में 'श्रद्धेय' का प्रयोग विशिष्टजनों  के लिए आदर और सम्मान सूचन शब्द के तौर पर होता है। 'श्री' का प्रयोग सामान्य शिष्टाचार के लिए किया जाता है। वह कहते हैं कि ये आदरसूचक और सम्मानसूचक शब्द हैं लेकिन राजनीतिक प्रयोग में अपना अर्थ खोते जा रहे हैं। प्रकाश का मानना है कि आज की राजनीति में शब्दों के चयन के लिए वह सतर्कता और गंभीरता नजर नहीं आती है, जो पुराने राजनीतिज्ञों जैसे कि जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी में थी। इन नेताओं में शब्दों के चयन का अभ्यास था और ये लोग परिस्थितियों के अनुकूल ही शब्दों का प्रयोग करते थे। 21 वीं शताब्दी की राजनीति में शब्द अपना महत्व खो रहे हैं, इसका कारण है कि जिन नेताओं को हम सुनते हैं, चुनते हैं उन्होंने शब्दों के प्रयोग को ही बदल दिया है।

अजीत पुरी कहते हैं कि हिंदी में 'जी', 'श्री' और 'श्रद्धेय' सम्मान जताने वाले शब्द हैं। इनका प्रयोग जहां मर्जी वहां नहीं किया जा सकता है। अगर आप किसी के विचारों से प्रेरित हैं तो आप उसे 'जी' कह  सकते हैं। आतंकवादियों के लिए 'जी' कहना दुर्भाग्यपूर्ण है।
 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें