Rahul Gandhi, Tejashwi Yadav
#02: सीट बंटवारा: भाजपा ने दिखाया त्याग, यूपीए में मची थी रार
एनडीए में जदयू की वापसी के साथ भाजपा का त्याग भी दिखा। साल 2014 में महज दो सीटों पर सिमटी जदयू 15 की उछाल के साथ 17 सीटों पर उम्मीदवारी लेने में कामयाब रही और 22 सीटों पर जीत हासिल करने वाली भाजपा(17) के बरक्स आ खड़ी हुई। वहीं लोजपा एक सीट की अदला-बदली के साथ संख्या के लिहाज से अपनी छह की छह सीटों पर उम्मीदवारी बचाने में कामयाब रही।
वहीं दूसरी ओर इस बार महागठबंधन में राजद-कांग्रेस-रालोसपा-हम-वीआईपी के बीच काफी रार मचने के बाद 20-9-5-3-3 के फॉर्मूले पर सीट बंटवारा हुआ। सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते राजद 20 सीटों पर चुनाव लड़ी और अपने ही कोटे से आरा सीट सीपीआई-एमएल के राजू यादव के लिए छोड़ दी थी। वहीं कांग्रेस नौ, रालोसपा पांच के अलावे हम और वीआईपी 3-3 सीटों पर चुनाव लड़ी।
राजद नेता तेजस्वी यादव लोकसभा प्रत्याशियों के नामों की घोषणा के बाद(File Photo)
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#03: बिहार को नहीं रास आया खिचड़ी महागठबंधन
2019 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा ने जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ गठबंधन किया। वहीं, दूसरी ओर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ इस बार उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हम और पिछले कुछ सालों में निषाद नेता के तौर पर उभरे मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी भी महागठबंधन में शामिल हुई।
एनडीए और यूपीए, दोनों के लिए ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने के मौके थे। दोनों ने पूरा जोर भी लगाया, लेकिन फायदा एनडीए को हुआ। रालोसपा, हम जैसे एनडीए से छिटके दल भी महागठबंधन में शामिल हो गए। मोदी विरोध में इकट्ठा हुए दलों का यह महागठबंधन बिहार के बड़े तबके को प्रभावित नहीं कर सका।
लालू प्रसाद यादव- नीतीश कुमार(फाइल फोटो)
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#04: पिछली बार से अलग सियासी समीकरणों का मिला लाभ
लोकसभा चुनाव 2014 में बिहार में सभी दल अलग-थलग पड़े थे। नीतीश कुमार की जदयू ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था और अकेले मैदान में उतरी थी। राजद, कांग्रेस और एनसीपी साथ लड़े थे, जबकि एनडीए में भाजपा के साथ रालोसपा और लोजपा शामिल थी। भागलपुर, कोसी, पूर्णिया प्रमंडलों को छोड़ दें तो मोदी लहर का अच्छा असर रहा था। प्रदेश की 40 लोकसभा सीटों में भाजपा को 22, लोजपा को छह, रालोसपा को तीन सीटों के साथ एनडीए कुल 31 सीटों पर काबिज हुई थी। वहीं, एनडीए से नाता तोड़ना सुशासन बाबू को महंगा पड़ा और जदयू के हिस्से केवल पूर्णिया और नालंदा, दो सीटें आई।
इस बार महाराष्ट्र में पुरानी सहयोगी शिवसेना की ही तरह बिहार में भी भाजपा अपनी पुरानी सहयोगी पार्टी जदयू को जोड़ने में कामयाब रही। वहीं, पिछली बार यूपीए को सात सीटों पर सत्ता हासिल हुई थी। राजद के हिस्से चार, कांग्रेस के हिस्से दो और एनसीपी को एक सीट हासिल हुई थी। इस बार इसमें और भी दल जुड़े, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
लालू प्रसाद यादव(File Photo)
#05: लालू कर सकते थे कमाल, पर नहीं मिल पाई जेल से बेल
महागठबंधन को सबसे ज्यादा कमी खली, तो वह रही लालू यादव की। चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट तक अर्जी लगाई, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिल पाई। बिहार की राजनीति में लालू के बिना चुनावी माहौल का रस काफी कम हो जाता है। लालू के भाषणों का जनमानस पर बड़ा असर पड़ता रहा है। उनकी अनुपस्थिति में तेजस्वी ने चुनाव प्रचार अभियान लीड करने की भरसक कोशिश की, लोग लालू के बेटे को सुनने की उम्मीद में सभा स्थल भी पहुंचते रहे, लेकिन रैली की भीड़ वोटों में पूरी तरह तब्दील नहीं हो पाई।