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बिहार में नीतीश-मोदी के कमाल और लालू की अनुपस्थिति में महागठबंधन के फेल होने की ये हैं 5 बड़ी वजहें

Thu, 23 May 2019 06:24 PM IST
Nilesh Kumar निलेश कुमार, चुनाव डेस्क, अमर उजाला
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Bihr election Results - फोटो : Amar Ujala
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सात चरणों में संपन्न हुए चुनाव के बाद आया रिजल्ट बिहार के लिए अप्रत्याशित रहा। पिछले आम चुनाव की मोदी लहर इस बार ऐसे सुनामी में तब्दील हुई कि विपक्ष आश्चर्यचकित रह गया। पीएम मोदी और नीतीश कुमार की जोड़ी ने यहां कमाल कर दिखाया, वहीं लालू के लाल तेजस्वी के नेतृत्व में महागठबंधन थोड़ा भी कमाल नहीं दिखा पाया। सातवें चरण के मतदान के बाद आए अधिकतर एग्जिट पोल्स ने बिहार में जिस तरह महागठबंधन के लगभग क्लीन स्वीप की भविष्यवाणी कर दी थी, वह चौंका देने वाला था। जब परिणाम सामने आए तो तस्वीर लगभग वही निकल कर सामने आती दिखी। 

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एनडीए के इस शानदार प्रदर्शन और महागठबंधन के असफल होने के पीछे पांच प्रमुख वजहें रहीं। आइए समझते हैं कि चुनाव परिणाम की पृष्ठभूमि किन सियासी समीकरणों पर तैयार हुई।

#01: 2014 के वोटों के गणित में छिपी थी एनडीए की जीत

2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में कुल 6,38,00,160 मतदाता थे, जिनमें से 3,53,04,368 मतदाताओं ने वोट डाले थे। यानि कुल मतदान फीसदी रहा था 55.33। कुल मतदान में से भारतीय जनता पार्टी को 1,05,43,025 वोट मिले थे यानि भाजपा को कुल 29.86 फीसदी वोट पड़े थे। दूसरे नंबर पर था राष्ट्रीय जनता दल, जिसे 20.46 फीसदी यानि 72,24,893 वोट मिले थे। तीसरे नंबर पर 16.04 फीसदी यानि 56,62,444 वोटों के साथ जनता दल यूनाइटेड(जदयू) थी।
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वहीं, कांग्रेस महज 8.56 फीसदी यानि कि 30,21,065 वोटों के साथ चौथे नंबर पर थी। रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा को 6.50 फीसदी यानि कि 22,95,929 वोट मिले थे। 2014 में इन तीनों दलों को पड़े वोटों को आधार मानें तो 52 प्रतिशत से ज्यादा वोट बनते थे। यानि यह तय था कि इन तीनों दलों के गठबंधन को 2014 की तरह वोट मिल जाते हैं यो यह राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस पर भारी पड़ सकते थे। वहीं, दूसरी ओर राजद और कांग्रेस का वोट प्रतिशत जोड़ें तो करीब 29 फीसदी वोट होते हैं, जोकि अपेक्षाकृत कम हैं।

Rahul Gandhi, Tejashwi Yadav
#02: सीट बंटवारा: भाजपा ने दिखाया त्याग, यूपीए में मची थी रार

एनडीए में जदयू की वापसी के साथ भाजपा का त्याग भी दिखा। साल 2014 में महज दो सीटों पर सिमटी जदयू 15 की उछाल के साथ 17 सीटों पर उम्मीदवारी लेने में कामयाब रही और 22 सीटों पर जीत हासिल करने वाली भाजपा(17) के बरक्स आ खड़ी हुई। वहीं लोजपा एक सीट की अदला-बदली के साथ संख्या के लिहाज से अपनी छह की छह सीटों पर उम्मीदवारी बचाने में कामयाब रही। 

वहीं दूसरी ओर इस बार महागठबंधन में राजद-कांग्रेस-रालोसपा-हम-वीआईपी के बीच काफी रार मचने के बाद 20-9-5-3-3 के फॉर्मूले पर सीट बंटवारा हुआ। सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते राजद 20 सीटों पर चुनाव लड़ी और अपने ही कोटे से आरा सीट सीपीआई-एमएल के राजू यादव के लिए छोड़ दी थी। वहीं कांग्रेस नौ, रालोसपा पांच के अलावे हम और वीआईपी 3-3 सीटों पर चुनाव लड़ी। 

राजद नेता तेजस्वी यादव लोकसभा प्रत्याशियों के नामों की घोषणा के बाद(File Photo) - फोटो : PTI
#03: बिहार को नहीं रास आया खिचड़ी महागठबंधन

2019 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा ने जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ गठबंधन किया। वहीं, दूसरी ओर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ इस बार उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हम और पिछले कुछ सालों में निषाद नेता के तौर पर उभरे मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी भी महागठबंधन में शामिल हुई।

एनडीए और यूपीए, दोनों के लिए ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने के मौके थे। दोनों ने पूरा जोर भी लगाया, लेकिन फायदा एनडीए को हुआ। रालोसपा, हम जैसे एनडीए से छिटके दल भी महागठबंधन में शामिल हो गए। मोदी विरोध में इकट्ठा हुए दलों का यह महागठबंधन बिहार के बड़े तबके को प्रभावित नहीं कर सका। 

लालू प्रसाद यादव- नीतीश कुमार(फाइल फोटो) - फोटो : PTI
#04: पिछली बार से अलग सियासी समीकरणों का मिला लाभ

लोकसभा चुनाव 2014 में बिहार में सभी दल अलग-थलग पड़े थे। नीतीश कुमार की जदयू ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था और अकेले मैदान में उतरी थी। राजद, कांग्रेस और एनसीपी साथ लड़े थे, जबकि एनडीए में भाजपा के साथ रालोसपा और लोजपा शामिल थी। भागलपुर, कोसी, पूर्णिया प्रमंडलों को छोड़ दें तो मोदी लहर का अच्छा असर रहा था। प्रदेश की 40 लोकसभा सीटों में भाजपा को 22, लोजपा को छह, रालोसपा को तीन सीटों के साथ एनडीए कुल 31 सीटों पर काबिज हुई थी। वहीं, एनडीए से नाता तोड़ना सुशासन बाबू को महंगा पड़ा और जदयू के हिस्से केवल पूर्णिया और नालंदा, दो सीटें आई। 

इस बार महाराष्ट्र में पुरानी सहयोगी शिवसेना की ही तरह बिहार में भी भाजपा अपनी पुरानी सहयोगी पार्टी जदयू को जोड़ने में कामयाब रही। वहीं, पिछली बार यूपीए को सात सीटों पर सत्ता हासिल हुई थी। राजद के हिस्से चार, कांग्रेस के हिस्से दो और एनसीपी को एक सीट हासिल हुई थी। इस बार इसमें और भी दल जुड़े, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। 
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लालू प्रसाद यादव(File Photo)
#05:  लालू कर सकते थे कमाल, पर नहीं मिल पाई जेल से बेल 

महागठबंधन को सबसे ज्यादा कमी खली, तो वह रही लालू यादव की। चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट तक अर्जी लगाई, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिल पाई। बिहार की राजनीति में लालू के बिना चुनावी माहौल का रस काफी कम हो जाता है। लालू के भाषणों का जनमानस पर बड़ा असर पड़ता रहा है। उनकी अनुपस्थिति में तेजस्वी ने चुनाव प्रचार अभियान लीड करने की भरसक कोशिश की, लोग लालू के बेटे को सुनने की उम्मीद में सभा स्थल भी पहुंचते रहे, लेकिन रैली की भीड़ वोटों में पूरी तरह तब्दील नहीं हो पाई। 
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