रैली आयोजन का खर्च (अनुमानित)
दरअसल एक प्रत्याशी चुनाव प्रचार के लिए लगभग 30-35 रैलियां करता है। एक सामान्य चुनावी रैली के लिए अनुमानित खर्च लगभग 20 से 30 हजार रुपए होता है। ऐसे में अगर एक प्रत्याशी 20 सामान्य रैलियां भी करता है, तो केवल रैलियों का खर्च ही करीब 10 लाख रुपए हो जाता है।
आने जाने का खर्च (अनुमानित)-
अब रैलियों में आवाजाही का खर्च भी उम्मीदवारों को खुद ही उठाना होता है। अगर एक उम्मीदवार आने-जाने के समय समेत 4 घंटे की 20 रैलियां करता है तो सबसे सस्ते सिंगल इंजन वाले हेलिकॉप्टर का खर्च 65 हजार रुपए प्रति घंटे के हिसाब से 52 लाख रुपए हो जाता है। डबल इंजन के हेलिकॉप्टर के लिए ये खर्च कहीं ज्यादा ठहरता है।
विज्ञापनों का खर्च (अनुमानित)-
इन सब के अलावा प्रचार के अन्य माध्यम जैसे होर्डिंग, अखबार में विज्ञापन, पार्टी झंडे और सोशल मीडिया विज्ञापन पर भी मोटी रकम खर्च होती है। जैसे विज्ञापन के लिए लगाए जाने वाले होर्डिंग का दाम लगभग 1-1.5 लाख रुपए प्रति माह होता है। अगर एक उम्मीदवार 10 होर्डिंग लगवाता है, तो उसका खर्च 10 लाख रुपए हो जाएगा। सोशल मीडिया पर विज्ञापन लोगों की संख्या पर निर्भर करता है, और उसका खर्च लगभग 50 हजार से एक लाख रुपए तक होता है। कुल मिला कर करीब 10 से 15 लाख रुपए केवल विज्ञापनों में खर्च होते हैं।
कुल खर्च (अनुमानित)-
इन सब के अलावा उम्मीदवारों की तरफ से एक मोटी रकम जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को खुश करने के लिए और लोगों को सीधे पैसे का लालच देने में खर्च की जाती है। हाई प्रोफाइल सीटों में यह रकम बढ़ कर 50 करोड़ रुपए हो जाती है।
अब इन अनुमानित खर्चों के आधार पर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि नोटों की पोटली टांग कर मैदान में पहुंचे उम्मीदवारों का वास्तविक चुनावी खर्च कितना होता होगा। उपर दिए गए अनुमानित आंकड़ों के हिसाब से एक उम्मीदवार का खर्च कम से कम 5 करोड़ के आसपास होता है।
ऐसे पैसा फेंक चुनाव में महज 70 लाख रुपए की वैधानिक राशि न जाने कहां गुम हो जाती होगी।