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भाजपा के अंकगणित पर टिकी विपक्ष की केमिस्ट्री, चुनाव बाद कौन होगा किसके साथ?

Fri, 17 May 2019 09:40 PM IST
Amit Digital  अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
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नरेंद्र मोदी-राहुल गांधी - फोटो : Social Media
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लोकसभा चुनाव 2019 के अंतिम चरण का मतदान रविवार को होगा, लेकिन चुनाव बाद की संभावित परिस्थितियों के हिसाब से राजनीतिक दल अभी से अपनी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। अगर भाजपा बहुमत से दूर रह जाती है तो इस परिस्थिति में विपक्ष किसकी अगुवाई में लामबंद किया जा सकेगा, इस पर मंथन शुरू हो गया है। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद पहले ही कह चुके हैं कि उनकी पार्टी प्रधानमंत्री पद के मुद्दे पर अड़ने वाली नहीं है और अन्य दलों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए वह किसी अन्य विकल्प पर भी विचार कर सकती है।  

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दरअसल, कांग्रेस के इस बयान को यूपीए खेमे के दलों को अपने से जोड़कर बनाए रखने और अन्य दलों के भाजपाई खेमे में जाने से रोके रखने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है, क्योंकि भाजपा चुनाव के बाद बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों को खुद से जोड़ने की कोशिश कर सकती है।

अगर एनडीए खेमा 250 के आसपास ठहर जाता है तो उसे बहुमत के जादुई आंकड़े 272 तक पहुंचने के लिए बहुत कम संख्या की जरूरत होगी। इस स्थिति में अनुमान लगाया जा रहा है कि आंध्र प्रदेश (25 लोकसभा सीटें) के जगनमोहन रेड्डी, तेलंगाना (17 लोकसभा सीटें) के केसीआर और ओडिशा (21 लोकसभा सीटें) के नवीन पटनायक एनडीए खेमे में जा सकते हैं। ये तीनों ही खिलाड़ी आज की स्थिति में अपनी-अपनी जमीन पर बहुत मजबूत स्थिति में हैं और इनके अच्छी संख्या में जीतकर लोकसभा में आने की संभावाना है। इन तीनों ही राज्यों की अपने लिए विशेष राज्य की मांग लंबे अरसे से रही है। इन शर्तों पर उन्हें खुद से जोड़ना भाजपा के लिए बहुत मुश्किल नहीं होगा।
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अगर एनडीए खेमा 225 सीटों के आसपास ठहर जाता है तो अमित शाह के लिए किसी नए और मजबूत साथी की तलाश करना ज्यादा चुनौती भरा काम होगा। बाकी सीटों की भरपाई के लिए उनके पास बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी या तृणमूल कांग्रेस जैसी किसी पार्टी से गठबंधन करने का विकल्प होगा। वर्तमान स्थिति में भाजपा ममता बनर्जी के लिए पश्चिम बंगाल में बड़ी चुनौती बनकर उभरी है, इसलिए उनके एनडीए खेमे में जाने की कोई संभावना फिलहाल नहीं है।

लेकिन यही बात मायावती के बारे में बहुत विश्वास के साथ नहीं कही जा सकती। अप्रत्याशित कदम उठाने के लिए मशहूर मायावती अपने राजनीतिक लाभ के लिए किसी भी खेमे से जुड़ सकती हैं। वे किस पाले में जाएंगी, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि किस खेमे से उनके लिए क्या ऑफर किया जाता है। हालांकि प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले मायावती किस पाले में जाएंगी, ये बसपा को मिली सीटों की संख्या के ऊपर भी निर्भर करता है।

वहीं अगर भाजपाई खेमा 200 सीटों के आसपास ठहर जाता है तो बाकी की सीटों की भरपाई करना अमित शाह के लिए संभव नहीं होगा। इस स्थिति में कांग्रेस की भूमिका सरकार बनाने के मामले में बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाएगी। इस स्थिति में सरकार चाहे जो बनाये, यह तय हो जाएगा कि उसमें कांग्रेस की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण होगी। और कोई भी सरकार उसकी सहमति के बिना नहीं बनेगी। ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए की सरकार बने और अन्य दलों को भी उसके साथ जोड़ा जाए, कांग्रेस इस रणनीति पर भी काम कर रही है।

वीरप्पा मोइली ने शुक्रवार सुबह ही यह कहकर कि कांग्रेस की अगुवाई में ही सरकार स्थायी हो सकती है, इसकी तरफ इशारा भी कर दिया है। लेकिन कांग्रेस को ड्राइविंग सीट तभी मिलेगी जब वह डेढ़ सौ के आसपास सीटें जीते। मौजूदा परिस्थिति में यह बहुत मुश्किल नहीं तो बहुत आसान भी नहीं है। लेकिन ऐसा न होने पर तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की प्रबल सम्भावनाएं हैं जिसके पिछले अनुभव देश के लिहाज से बहुत सकारात्मक नहीं रहे हैं। लेकिन अगर ऐसा होता है तो देश एक बार फिर अस्थिरता के भंवर में गोते लगा सकता है। 
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