भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पहले ही लोकसभा चुनाव 2019 में वह पानीपत की लड़ रहे हैं। इसके कमांडर-इन-चीफ मोदी जी हैं। शाह उनके कुशल रणनीतिकार हैं। खबर है कि भोपाल में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर इसी रणनीति से मैदान में हैं। पहले भाजपा ने यहां से पूर्व सीएम शिवराज का विरोधी जानकर उमा भारती का मन टटोला, लेकिन उमा ने मना कर दिया। शिवराज का इरादा खुद विदिशा या भोपाल से मैदान में उतरने का था, लेकिन भाजपा ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
इसके बाद शिवराज ने पत्नी साधना को मैदान में उतारने की बात बढ़ाई, लेकिन उन्हें भी ना ही मिली। अंतत: हिन्दुत्व का चेहरा बन भगवा साध्वी चुनाव मैदान में हैं। मतलब साफ है-शिवराज जी जरा ठाड़े बैठिए। ऐसा ही हाल राजस्थान में वसुंधरा राजे का है। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह खुद इज्जत बचाते फिर रहे हैं। नागपुर में नाना पटोले ने नितिन गड़करी को चुनौती दे दी है। संघ चिंतित है। पटोले कभी गड़करी के खेमे में ही थे। इस बार गड़करी का पैर गैरों ने नहीं अपनों ने खींच लिया है। गड़करी को ऐसी आशंका पहले ही थी। संघ ने भी चेताया था, लिहाजा वह सुमित्रा महाजन की सीट से लड़ना चाहते थे।
उन्हें इल्म था कि ताई को टिकट नहीं मिलेगा, लेकिन टीम शाह ने उन्हें नागपुर भेज दिया। स्वास्थ्य कारणों से सुषमा स्वराज न तो चुनाव मैदान में हैं और न ही खुलकर प्रचार में। उमा भारती भी मैदान के किनारे खड़ी होकर खेल रही हैं। कई और नेताओं को गुजरात टीम ने बैठा रखा है। मतलब साफ है कि टीम शाह जितनी लड़ाई बाहर लड़ रही है, उससे कहीं ज्यादा बड़ी भीतरी जंग लड़ रही है। खबर यह भी है इस लड़ाई दूसरा दौर 23 मई को नतीजा आने के बाद जोरदार ढंग से देखने को मिल सकता है।
प्रियंका को राज्यसभा टिकट का भरोसा
कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख और चैंपियन प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला की चैंपियन सहयोगी प्रियंका चतुर्वेदी को राज्यसभा सीट मिलेगी। शिवसेना ने भरोसा दे दिया है। प्रियंका के इस रास्ते में कहीं न कहीं प्रशांत किशोर का हाथ बताया जा रहा है। कहते हैं इस रास्ते को तय करने में भाजपा की टीम ने भी भूमिका निभाई है। दरअसल प्रियंका शिवसेना से पहले भाजपा खेमे के संपर्क में थी, लेकिन भाजपा ने उनकी उम्मीदवारी या फिर राज्यसभा सीट दोनों से परहेज कर लिया। भाजपा की तरफ से उन्हें यही संदेश मिला कि पहले वह पार्टी ज्वाइन कर लें। लेकिन प्रियंका तो पक्कीबात चाहती थीं।
बताते हैं राहुल गांधी को इसकी भनक समय रहते लग गई थी। इसकी आशंका पहले मुंबई के एक कांग्रेस नेता ने जताई थी। दरअसल प्रियंका मुंबई से टिकट चाहती थीं। लेकिन उर्मिला मातोंडकर समेत तीन महिलाओं को टिकट दे दिया था। संजय निरुपम के उम्मीदवारी की घोषणा हो चुकी थी, ऐसे में प्रियंका के लिए गुंजाइश ही नहीं बची। बताते हैं इन तमाम डेवलपमेंट से सुरजेवाला भी अवगत थे। उनके समय में ही प्रियंका को कांग्रेस में उछाल मिल रही थी। सब मिलाकर शिवसेना से संकेत मिलने के बाद एक बहाना चाहिए थे।
मथुरा में छाता के उमेश पंडित पहले से रणदीप सुरजेवाला की खुलकर मुखालफत करते रहे हैं। प्रियंका चतुर्वेदी की भी करते रहे हैं। लिहाजा सबकुछ सोच समझकर हुआ। जैसे ही प्रियंका राफेल पर प्रेस कांफ्रेस करने पहुंची, उमेश पंडित की परशुरामी टीम पहुंच गई। निशाने पर रणदीप सुरजेवाला थे और मोहरा प्रियंका चुतर्वेदी थीं। इसके बाद तो सब जानते हैं कि आगे क्या हुआ?
अब सामने बस ठा. राजनाथ सिंह हैं
नितिन गड़करी चर्चा से गायब हैं। नागपुर में उनकी हालत पतली बताई जा रही है। कुल मिलाकर भाजपा में दमखम वाले नेता ठा. राजनाथ सिंह हैं। प्रधानमंत्री मोदी और शाह के सामानांतर हैसियत रखते हैं। राजनाथ की खासियत है कि वह हवा का रुख देखकर अपने राजनीति की धारा को डिजाइन कर लेते हैं। पिछले साढे चार साल से वह बहुत संभलकर चल रहे हैं। विवाद से कोसों दूर रहकर हर संभव तालमेल पर भरोसा कर रहे हैं। लखनऊ संसदीय सीट से दूसरी बार चुनाव मैदान में है और जोरदार मुकाबला होना है।
राजनाथ सिंह भाजपा के उन नेताओं की उम्मीद भी हैं, जो टीम गुजरात से खुन्नस खाए हैं। यह वर्ग मानकर चल रहा है कि यदि कदाचित बहुमत से एनडीए दूर रहा तो भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष बड़ी पारी खेल सकते हैं। वैसे भी यह उनकी किस्मत में रहा है। दो की लड़ाई में तीसरे का भला। चाहे उ.प्र. में मुख्यमंत्री का पद रहा हो या फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल। खबर यह भी है कि टीम गुजरात की इस किस्मत पर भी बारीक निगाह है।