फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कानों देखी : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पानीपत की लड़ाई, बनारस में होगा घमासान

Sun, 21 Apr 2019 01:50 PM IST
आसिम खान शशिधर पाठक, नई दिल्ली
विज्ञापन
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पहले ही लोकसभा चुनाव 2019 में वह पानीपत की लड़ रहे हैं। इसके कमांडर-इन-चीफ मोदी जी हैं। शाह उनके कुशल रणनीतिकार हैं। खबर है कि भोपाल में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर इसी रणनीति से मैदान में हैं। पहले भाजपा ने यहां से पूर्व सीएम शिवराज का विरोधी जानकर उमा भारती का मन टटोला, लेकिन उमा ने मना कर दिया। शिवराज का इरादा खुद विदिशा या भोपाल से मैदान में उतरने का था, लेकिन भाजपा ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। 

विज्ञापन


इसके बाद शिवराज ने पत्नी साधना को मैदान में उतारने की बात बढ़ाई, लेकिन उन्हें भी ना ही मिली। अंतत: हिन्दुत्व का चेहरा बन भगवा साध्वी चुनाव मैदान में हैं।  मतलब साफ है-शिवराज जी जरा ठाड़े बैठिए। ऐसा ही हाल राजस्थान में वसुंधरा राजे का है। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह खुद इज्जत बचाते फिर रहे हैं। नागपुर में नाना पटोले ने नितिन गड़करी को चुनौती दे दी है। संघ चिंतित है। पटोले कभी गड़करी के खेमे में ही थे। इस बार गड़करी का पैर गैरों ने नहीं अपनों ने खींच लिया है। गड़करी को ऐसी आशंका पहले ही थी। संघ ने भी चेताया था, लिहाजा वह सुमित्रा महाजन की सीट से लड़ना चाहते थे। 

उन्हें इल्म था कि ताई को टिकट नहीं मिलेगा, लेकिन टीम शाह ने उन्हें नागपुर भेज दिया। स्वास्थ्य कारणों से सुषमा स्वराज न तो चुनाव मैदान में हैं और न ही खुलकर प्रचार में। उमा भारती भी मैदान के किनारे खड़ी होकर खेल रही हैं। कई और नेताओं को गुजरात टीम ने बैठा रखा है। मतलब साफ है कि टीम शाह जितनी लड़ाई बाहर लड़ रही है, उससे कहीं ज्यादा बड़ी भीतरी जंग लड़ रही है। खबर यह भी है इस लड़ाई दूसरा दौर 23 मई को नतीजा आने के बाद जोरदार ढंग से देखने को मिल सकता है।
विज्ञापन


प्रियंका को राज्यसभा टिकट का भरोसा

कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख और चैंपियन प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला की चैंपियन सहयोगी प्रियंका चतुर्वेदी को राज्यसभा सीट मिलेगी। शिवसेना ने भरोसा दे दिया है। प्रियंका के इस रास्ते में कहीं न कहीं प्रशांत किशोर का हाथ बताया जा रहा है। कहते हैं इस रास्ते को तय करने में भाजपा की टीम ने भी भूमिका निभाई है। दरअसल प्रियंका शिवसेना से पहले भाजपा खेमे के संपर्क में थी, लेकिन भाजपा ने उनकी उम्मीदवारी या फिर राज्यसभा सीट दोनों से परहेज कर लिया। भाजपा की तरफ से उन्हें यही संदेश मिला कि पहले वह पार्टी ज्वाइन कर लें। लेकिन प्रियंका तो पक्कीबात चाहती थीं। 

बताते हैं राहुल गांधी को इसकी भनक समय रहते लग गई थी। इसकी आशंका पहले मुंबई के एक कांग्रेस नेता ने जताई थी। दरअसल प्रियंका मुंबई से टिकट चाहती थीं। लेकिन उर्मिला मातोंडकर समेत तीन महिलाओं को टिकट दे दिया था। संजय निरुपम के उम्मीदवारी की घोषणा हो चुकी थी, ऐसे में प्रियंका के लिए गुंजाइश ही नहीं बची। बताते हैं इन तमाम डेवलपमेंट से सुरजेवाला भी अवगत थे। उनके समय में ही प्रियंका को कांग्रेस में उछाल मिल रही थी। सब मिलाकर शिवसेना से संकेत मिलने के बाद एक बहाना चाहिए थे। 

मथुरा में छाता के उमेश पंडित पहले से रणदीप सुरजेवाला की खुलकर मुखालफत करते रहे हैं। प्रियंका चतुर्वेदी की भी करते रहे हैं। लिहाजा सबकुछ सोच समझकर हुआ। जैसे ही प्रियंका राफेल पर प्रेस कांफ्रेस करने पहुंची, उमेश पंडित की परशुरामी टीम पहुंच गई। निशाने पर रणदीप सुरजेवाला थे और मोहरा प्रियंका चुतर्वेदी थीं। इसके बाद तो सब जानते हैं कि आगे क्या हुआ?

अब सामने बस ठा. राजनाथ सिंह हैं

नितिन गड़करी चर्चा से गायब हैं। नागपुर में उनकी हालत पतली बताई जा रही है। कुल मिलाकर भाजपा में दमखम वाले नेता ठा. राजनाथ सिंह हैं। प्रधानमंत्री मोदी और शाह के सामानांतर हैसियत रखते हैं। राजनाथ की खासियत है कि वह हवा का रुख देखकर अपने राजनीति की धारा को डिजाइन कर लेते हैं। पिछले साढे चार साल से वह बहुत संभलकर चल रहे हैं। विवाद से कोसों दूर रहकर हर संभव तालमेल पर भरोसा कर रहे हैं। लखनऊ संसदीय सीट से दूसरी बार चुनाव मैदान में है और जोरदार मुकाबला होना है। 

राजनाथ सिंह भाजपा के उन नेताओं की उम्मीद भी हैं, जो टीम गुजरात से खुन्नस खाए हैं। यह वर्ग मानकर चल रहा है कि यदि कदाचित बहुमत से एनडीए दूर रहा तो भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष बड़ी पारी खेल सकते हैं। वैसे भी यह उनकी किस्मत में रहा है। दो की लड़ाई में तीसरे का भला। चाहे उ.प्र. में मुख्यमंत्री का पद रहा हो या फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल। खबर यह भी है कि टीम गुजरात की इस किस्मत पर भी बारीक निगाह है।

विज्ञापन

हाथ मल रही हैं प्रतिभा आडवाणी

प्रतिभा आडवाणी यह कैलकुलेट करके परेशान हो रही हैं कि आखिर उनके हिस्से क्या आया? वह अपने पिता लालकृष्ण आडवाणी के अपमान से भी व्यथित हैं। प्रतिभा आडवाणी को वह दौर भी याद है कि कैसे कभी वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी उनसे अपनी बात आडवाणी जी तक पहुंचाते थे। कुछ केन्द्रीय मंत्री भी और कैसे अपना नंबर बढ़ाने, अवसर भुनाने में आडवाणी जी का लोगों ने साथ छोड़ना शुरू कर दिया। टीम प्रतिभा के सदस्य की मानें तो खरी खरी कहने वाली प्रतिभा मौजूदा दौर को कम अच्छी लगती हैं। जयंत आडवाणी पहली पसंद हैं। 

वहीं लाल कृष्ण आडवाणी की पहली पसंद बेटी प्रतिभा हैं, जयंत से उनकी बोलचाल भी न के बराबर होती है। आडवाणी जी जयंत के बजाय अपनी पोती और जयंत की बेटी के साथ समय बिताना पसंद करते हैं। जयंत और प्रतिभा के रिश्ते सामान्य नहीं हैं। प्रतिभा सामाजिक कार्यों में रुचि लेती हैं। राजनीति में भी उनकी दिलचस्पी रहती है। वैसे बड़ा सवाल यही है कि आगे क्या? खबर है कि वह भी कुछ न कुछ भविष्य का मॉडल डिजाइन कर रही हैं, लेकिन इस डिजाइन की उम्मीद भी 23 मई 2019 को आने वाले नतीजे पर टिकी हैं।

मिलिंद देवड़ा का दमखम

पूर्व केन्द्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा राहुल गांधी की कोटरी के हैं। युवा हैं। अच्छे आर्थिक साम्राज्य के मालिक हैं। दक्षिमी मुंबई सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। वह मोदी लहर में भी अपना चुनाव जीत गए थे। मिलिंद देवड़ा का प्रचार मशहूर उद्योगपति मुकेश अंबानी कर रहे हैं। मिलिंद के पिता ने भी यूपीए सरकार के समय केन्द्रीय मंत्री रहते हुए अपना धर्म निभाया था। 

न केवल मुकेश अंबानी बल्कि कई ऐसा उद्योगपति और कारोबारी परिवार भी मिलिंद के साथ खड़े हैं जो भाजपा, खासकर प्रधानमंत्री मोदी के करीब रहे हैं। बताते हैं मिलिंद का ताना बाना महाराष्ट्र में राहुल गांधी की ताकत भी है। यही एक वह कड़ी है, जहां भाजपा के दिग्गज भी खामोश हैं। आखिरकार भारत एक लोकतांत्रिक देश है।

बनारस में होगा घमासान

बनारस में राजनीति का अच्छा घमासान देखने को मिल सकता है। वहां से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उम्मीदवार हैं। 26 अप्रैल को पर्चा दाखिल करेंगे। इस तारीख के आस-पास ही एक बड़ी सूचना आनी है। कांग्रेस यह मुतमईन करने में लगी है कि कैसे प्रधानमंत्री मोदी को कड़ी टक्कर दी जाए। सपा-बसपा गठबंधन साथ दें तो मुमकिन है। यही सवाल सपा-बसपा गठबंधन के लिए भी अहम है। वह दो फेर में हैं। पहला कड़ी टक्कर दी जाए या नहीं? दी जाए तो प्रत्याशी किसका हो? खैर, भीम आर्मी के चंद्रशेखर ने बनारस से अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली है। 

रणनीति को आगे बढ़ाते हुए राबर्ट वाड्रा, प्रियंका गांधी वाड्रा और कुछ नेताओं की तरफ से इसके संकेत दिए जा रहे हैं कि कांग्रेस की उम्मीदवार के तौर पर प्रियंका संभव हैं। गणित भी पक्ष में है। ब्राह्मण बाहुल बनारस में अल्पसंख्यक भी बराबर की संख्या में हैं। भूमिहार अजय राय, ब्राह्मण राजेश मिश्रा, औरंगाबाद हाऊस का कमलापति त्रिपाठी परिवार और अन्य हैं। ऐसे में गटबंधन ने साथ दिया तो प्रधानमंत्री जीत भले जाएं, लेकिन प्रतिष्ठा बचाने उतरना पड़ेगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पहले ही कह चुके हैं कि प्रिंयका लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेगी और लड़ेंगी तो विशेष परिस्थितियों में। 

इसके साथ कांग्रेस ने अमेठी सीट को लेकर चर्चा चला रखी है। वह यह कि वायनाड और अमेठी से जीतने के बाद राहुल गांधी अमेठी सीट छोड़ देंगे। इसके बाद यह विरासत प्रियंका संभालेंगी और उ.प्र. तथा दक्षिण भारत एक कड़ी में जुड़ जाएगा। इस बात में तब और दम आ जाता है कि जब राहुल गांधी कहते हैं कि उन्होंने प्रियंका और ज्योतिरादित्य को 2022 में उ.प्र. में अगली सरकार बनाने की जिम्मेदारी दे रखी है।

पश्चिम बंगाल का रण

ममता बनर्जी पसीना पोछ रही हैं। उन्हें भाजपा की चुनौती दिखाई दे रही है, हालांकि 42 में से उनकी टीम के सदस्य 34-36 सीट जीत लेने का दावा कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में म.प्र. के धाकड़ नेता कैलाश विजयवर्गीज ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का मूड देखकर तगड़ी गोट बिछा रखी है। मुकुल राय सरीखे पूर्व तृणमूल कांग्रेस के नेता कमान थामकर भाजपा को खड़ा करने में लगे हैं। 

सबका दावा है कि 42 में से 21 सीट तक ला सकते हैं। वैसे भी भाजपा को उ.प्र., बिहार से होने वाले नुकसान की कुछ भरपाई पश्चिम बंगाल, केरल और उड़ीसा से होने की उम्मीद है। कुल मिलाकर भाजपा और तृणमूल लड़ रही हैं। कांग्रेस और सीपीएम अंदर खाने में लड़ रही हैं। सीपीएम केरल के वायनाड से राहुल गांधी के उतरने पर भी खफा सी है। 

जगनमोहन रेड्डी बनाम चंद्रबाबू नायडू

जगनमोहन रेड्डी राजनीतिक दांवपेंच में काफी मास्टर हो गए हैं। पूरे आंध्र की पदयात्रा करके उन्होंने पार्टी के भीतर जानफूंक दी है। कुछ तिकड़म उन्हें प्रशांत किशोर बता देते हैं। हाल में जगनमोहन रेड्डी ने यह कहकर सबको हैरान कर दिया कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी को माफ कर दिया है। आगे सहयोग कर सकते हैं। बताते हैं जगनमोहन रेड्डी को यह संदेश भी रणनीतिक कारणों से देना पड़ा। कुल मिलाकर वह सीएम बनने की पारी खेल रहे हैं। तेलंगाना राष्ट्रसमिति (तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव की पार्टी) के साथ तालमेल ठीक है। 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी अपनी उम्मीद का घोड़ा छोड़ रखा है। बताते हैं कांग्रेस इस घटनाक्रम पर बारीकी से निगाह है। इसके सामानांतर आंध्रप्रदेश को सपना दिखाने वाले चंद्रबाबू नाडयू मुख्यमंत्री की कुर्सी बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कांग्रेस इस संघर्ष में पूर्व सीएम किरण कुमार रेड्डी को अहम जिम्मेदारी दे रखी है। चंद्रबाबू नायडू ने भी पवन कल्याण को खड़ा कर रखा है। वह अपनी पार्टी बनाकर मैदान में हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें