महाभारत की गवाह रही हरियाणा की धरती इस बार जातिवाद में भंवर में फंस गई है। इसी वजह से 12 मई को होने जा रही वोटिंग में प्रदेश के 9 दिग्गजों के सामने उनकी राजनीतिक विरासत बचाने की बड़ी चुनौती पेश आ रही है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा को अपनी-अपनी सीटें निकालने के लिए कड़ी मशक्कत का सामना करना पड़ रहा है।
इनके अलावा जो दूसरे उम्मीदवार अपनी राजनीतिक विरासत बचाने के लिए चुनाव मैदान में हैं, उनमें दिग्विजय चौटाला सोनीपत सीट, दुष्यंत चौटाला हिसार, श्रुति चौधरी भिवानी-महेंद्रगढ़, अर्जुन चौटाला कुरुक्षेत्र, राव इंद्रजीत गुरुग्राम, कुमारी शैलजा अंबाला, भव्य बिश्नोई हिसार और ब्रजेंद्र सिंह हिसार, शामिल हैं। प्रदेश में चल रही जातिवाद की लहर ने इन सभी उम्मीदवारों की जीत-हार के समीकरण बिगाड़ दिए हैं।
प्रदेश में विकास का कोई मुद्दा नहीं हैं। देश के दूसरे राज्यों में कहीं राहुल तो कहीं मोदी फैक्टर काम कर रहा है, लेकिन हरियाणा में ये दोनों ही नाम नहीं हैं। केवल पार्टी या उसके उम्मीदवार ही पीएम नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी का नाम ले रहे हैं, लेकिन आम जनता के बीच अगर इन दोनों नेताओं की बात की जाए तो ये दोनों कहीं नहीं ठहरते। खासतौर पर, जाट समुदाय के उम्मीदवार खुद को जातिवाद और आरक्षण के चक्रव्यूह में फंसा हुआ पा रहे हैं।
पीएम नरेंद्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अमित शाह जैसे धुरंधर नेता हरियाणा आकर चुनाव को मोदी-राहुल पर केंद्रित करने का भरसक प्रयास कर चुके हैं, लेकिन वे जातिवाद को दूर नहीं कर पाए। जातिवाद यानी जाट और नॉन जाट फैक्टर के चलते इस बार वे सीटें भी कड़े मुकाबले में फंस गई हैं, जिन्हें पहले बहुत सामान्य माना जाता था। जैसे, रोहतक सीट पर भूपेंद्र हुड्डा के पुत्र दीपेंद्र हुड्डा जो कि पहले ही सांसद बनाने की हैट्रिक लगा चुके हैं। इस बार उन्हें भाजपा उम्मीदवार डॉ. अरविंद शर्मा की ओर से कड़ी टक्कर मिल रही है। यहां तक कि प्रियंका गांधी को दीपेंद्र के समर्थन में रोड शो निकालना पड़ा।
उसके बाद पंजाब सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू भी यहां प्रचार के लिए आए हैं।जो स्थिति इस बार है, वैसी पहले कभी नहीं देखी गई। 2016 में आरक्षण के नाम पर हरियाणा में जो दंगे हुए, उसके बाद जाट और गैर-जाट के बीच फासला बढ़ता चला गया। राजनीतिक दलों ने दिखावे के लिए भाईचारा सम्मेलन आयोजित किया, लेकिन वह सब ढकोसला ही निकला। कहीं न कहीं राजनीतिक दलों ने भी जाट और नॉन जाट फैक्टर को ही आगे बढ़ा दिया। आज हालत यह है कि प्रदेश की दस साल तक कमान संभालने वाले पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को अपनी सोनीपत सीट निकालने के लिए लोगों के सामने झुकना पड़ रहा है।
दस मई को गोहाना रैली में मंच पर भाषण देने के दौरान हुड्डा अलग से दूर आकर लोगों के सामने कई बार झुके। उन्होंने कहा, कि वे आरक्षण दंगों के आरोपियों को सजा दिलाकर रहेंगे। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि दंगों के पीछे पूर्व सीएम और उनकी पार्टी का हाथ था। हम सभी वर्गों को एक साथ लेकर आगे बढ़े हैं। नतीजा, लोग समझ गए हैं कि उनका असली हितैषी कौन है। कांग्रेस की पोल खुल चुकी है। 23 मई को आने वाले नतीजे बता देंगे कि कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच।