जाट आरक्षण प्रमुख मुद्दा
हरियाणा के चुनाव में इस बार जाट आरक्षण प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। चुनावों में जातिगत समीकरण के तहत इसी ने निर्णायक भूमिका निभाई है। जाट नेताओं का आरोप है कि भाजपा सरकार ने उनके समुदाय को नौकरियों में 10 प्रतिशत कोटे का बचाव सुप्रीम कोर्ट में पर्याप्त रूप से नहीं किया।
हालांकि, भाजपा को जींद विधानसभा उपचुनाव जीतने के बाद हरियाणा में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है। यहां से कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला मैदान में थे। तब भाजपा ने इनेलो के विधायक हरि चंद मिड्ढा के पुत्र कृष्ण मिड्ढा को उतारा था और सुरजेवाला को हराया था।
हरियाणा में आबादी के लिहाज से जाटों की संख्या सबसे अधिक है। ऐसे में राजनीतिक दल भी जाटों को लुभाने में लगे हुए हैं। इस फेहरिस्त में अब जननायक जनता पार्टी भी जुड़ गई है। ये पार्टी चौटाला परिवार में पड़ी दरार के बाद आईएनएलडी से टूटकर बनी है। जेजेपी के दुष्यंत चौटाला ने आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन किया है। चूंकि जजपा भी जाटों का ही प्रतिनिधित्व करती है, तो जाहिर है ये पार्टी आईएनएलडी के वोट बैंक में सेंध लगाएगाी।
जाट वोटर भाजपा से नाराज बताए जा रहे हैं। गैर जाट मतदाता जाट आंदोलन के वक्त हुई हिंसा में काफी प्रभावित हुए थे। उनकी नाराजगी खट्टर को लेकर बरकरार बताई जाती है। आंदोलन के वक्त उनकी करोड़ों की संपत्ति खाक हो गई थी। खट्टर सरकार और भाजपा को इसे लेकर खूब आलोचना का सामना भी करना पड़ा था। उनके गुस्से का असर इस चुनाव में दिख सकता है। यानी भाजपा के एक तरफ खाई है तो दूसरी तरफ कुंआ और पार्टी को इसी चुनौती से पार पाना है।
बहरहाल, इस चुनाव में एक तरफ मोदी का राष्ट्रवाद है, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी का 72 हजार का न्याय है। सैनिकों से भरी हरियाणा की जमीन को मोदी का राष्ट्रवाद तो भा रहा है लेकिन हरियाणा का वोटर इसबार मोदी के साथ खट्टर सरकार को भी चुनावी कसौटी में तौल सकता है। यही भाजपा के लिए मुसीबत का सबब है।