इस साल नवंबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के चुनाव होने हैं। इन राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा कर चुनाव छह महीने बाद कराया जा सकता है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में विधानसभा चुनाव वैसे भी लोकसभा चुनाव के साथ ही होने तय हैं।
महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, बिहार और दिल्ली में चुनाव लोकसभा चुनाव के 6 से 8 महीनों के बाद हुए थे। इनमें सिर्फ दिल्ली ही ऐसा राज्य है जहां भाजपा की सरकार नहीं है। अन्य चारों राज्यों की सरकारें समय से पहले विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर चुनाव लोकसभा के साथ करा सकती हैं।
चुनाव आयोग के पूर्व सलाहकार केजे राव का कहना है कि चुनाव का समय तय करना आयोग का काम नहीं है। कानूनन समय से छह महीने पहले किसी भी वक्त चुनाव कराया जा सकता है।
चुनाव टालने को संविधान संशोधन की जरूरत
संविधान विशेषज्ञों के मुताबिक केंद्र सरकार को राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव छह महीने टालने के लिए संविधान संशोधन करना पड़ेगा। लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी अचारी कहते हैं कि राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए भी संविधान-सम्मत प्रक्रिया के पालन के साथ संसद के दोनों सदनों से इसका अनुमोदन भी कराना होगा। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के संयोजक प्रो. जगदीप छोकर कहते हैं कि बिना वाजिब वजह के लगाए गए राष्ट्रपति शासन को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
पार्टी के सामने हैं दो विकल्प
भाजपा सूत्रों के अनुसार इस स्थिति से निपटने के लिए दो रास्ते हैं। पहला लोकसभा और अन्य 10 राज्यों के चुनाव इसी साल नवंबर-दिसंबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ करा लिए जाएं। इसके लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं होगी। दूसरा रास्ता थोड़ा पेचीदा है। उसमें पहले इन चार राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाना है। दूसरा कदम विपक्ष द्वारा संसद या अदालत में उसे चुनौती देने पर इस प्रस्ताव को गिरने देना है। इसके बाद इसे एक चुनावी मुद्दे में तब्दील करना है।
एक साथ चुनाव के खिलाफ है विपक्ष
वहीं, कांग्रेस सहित लगभग सभी विपक्षी दल विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा के साथ कराने के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि भाजपा इस साल नवंबर में होने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन की आशंका के मद्देनजर भाजपा यह कदम उठा रही है।
चार बार हो चुके हैं एक साथ चुनाव
राज्यसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ योगेंद्र नारायण कहते हैं कि आजादी के बाद हुए लोकसभा के चार चुनावों के साथ ही सभी विधानसभाएं के चुनाव भी हुए थे। यह प्रक्रिया 1967 में टूटी जब इंदिरा गांधी ने राजनीतिक विरोधियों की राज्य सरकारों को एकसाथ बर्खास्त कर दिया था। अब यह परंपरा फिर शुरू की जा सकती है।