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Lithuania Envoy: संस्कृत और लिथुआनिया के बीच भाषाई संबंधों की खोज शुरू, दूत ने कहा- स्थापित करने हैं संबंध

Tue, 24 Oct 2023 04:13 AM IST
यशोधन शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

इन दो भाषाओं के बीच गहरे संबंध को पहचानने के महत्व पर बोलते हुए, राजदूत डायना मिकेविसीन ने बताया कि लिथुआनियाई, संस्कृत की सबसे करीब है और यह भाषा दोनों देशों के बीच एक अद्वितीय पुल के रूप में कार्य करती है। 
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डायना मिकविसीन - फोटो : ANI
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विस्तार
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भारत और लिथुआनिया के बीच सांस्कृतिक और भाषाई संबंधों को मजबूत करने के एक ठोस प्रयास में, एक लिथुआनियाई संस्कृत विद्वान, विटिस विदुनस, और भारत में लिथुआनिया की राजदूत डायना मिकविसीन ने संस्कृत और लिथुआनियाई भाषा के बीच गहरे भाषाई संबंधों का पता लगाने के लिए एक मिशन शुरू किया है।  इन दो भाषाओं के बीच गहरे संबंध को पहचानने के महत्व पर बोलते हुए, राजदूत डायना मिकविसीन ने बताया कि लिथुआनियाई भाषा संस्कृत के सबसे करीब है और यह भाषा दोनों देशों के बीच एक अद्वितीय पुल के रूप में कार्य करती है। 

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लिथुआनियाई दूतावास ने इस संबंध को बढ़ावा देने में एक सक्रिय भूमिका निभाई है, और भाषाओं द्वारा साझा की गई दिलचस्प समानताओं को उजागर करने के लिए संस्कृत विद्वान विटिस विदुनस द्वारा व्याख्यान की एक श्रृंखला का आयोजन किया है। ये समानताएं मात्र शब्दावली से परे, व्याकरणिक संरचना को भी शामिल करती हैं। मिकेविसीन ने कहा, यह रहस्योद्घाटन जागरूकता बढ़ाने और भारतीय और लिथुआनियाई दोनों विद्वानों को शामिल करते हुए इस कम खोजे गए भाषाई संबंध पर आगे के शोध को आगे बढ़ाने का प्रयास करता है। 

संस्कृत और लिथुआनियाई भाषा के बीच घनिष्ठ संबंध
लिथुआनियाई संस्कृत विद्वान विटिस विदुनस ने आम भाषाई विरासत के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा, कि हम लिथुआनिया और भारत के बीच कुछ संबंध बनाना चाहते हैं क्योंकि अतीत में हमारे बीच कई सामान्य विशेषताएं रही हैं।" विदुनस ने संस्कृत और लिथुआनियाई के बीच समानताओं, विशेषकर शब्दों और व्याकरणिक संरचनाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा, 'हमारे पास लिथुआनियाई भाषा है और भारत में संस्कृत है, और उनके बीच घनिष्ठ संबंध हैं, खासकर शब्द और व्याकरणिक संरचनाएं। आज मैं इन समानताओं के बारे में बात करने की कोशिश करूंगा और भारतीयों को इन समानताओं से परिचित कराऊंगा।'
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उन्होंने 108 शब्दों वाले एक शब्दकोश को प्रकाशित करने का भी उल्लेख किया जो सीधे प्रारंभिक संस्कृत और लिथुआनियाई से मेल खाता है और इस भाषाई क्षेत्र में आगे की खोज की संभावना पर प्रकाश डालता है। आयोजित व्याख्यान 'कृति-संहिता: भारतीय ज्ञान प्रणालियों की बहुलता' व्याख्यानों की श्रृंखला में बारहवां है, जो भारत के विदेश मंत्रालय के सहयोग से आईआईसी-अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान प्रभाग के सहयोग से आयोजित किया गया और इसकी अध्यक्षता भारतीय विद्या भवन के केएम मुंशी सेंटर फॉर इंडोलॉजी की डीन प्रोफेसर डॉ. शशि बाला ने की।

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