कर्नाटक में 10 मई को विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में राज्य के हर हिस्से के अंदरूनी तस्वीर को समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्येक राजनीतिक दल का अलग-अलग प्रभाव है। यहां हम बात कर रहे हैं राज्य के कित्तूर कर्नाटक क्षेत्र का जिसे पहले मुंबई या बॉम्बे कर्नाटक क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। कित्तूर कर्नाटक क्षेत्र में 50 विधानसभा आते हैं।
सात जिलों से मिलकर बना है कित्तूर कर्नाटक क्षेत्र
बेलागवी, धारवाड़, विजयपुरा, हावेरी, गडग, बागलकोट और उत्तर कन्नड़ जैसे सात जिलों से मिलकर बने इस क्षेत्र में सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई है।यहां जनता दल (सेक्युलर) काफी कमजोर है। राज्य सरकार ने 2021 में 'मुंबई-कर्नाटक' से 'कित्तूर कर्नाटक' के रूप में इस क्षेत्र का नाम बदलने का फैसला किया था, यह आजादी से पहले तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी के अधीन था। कित्तूर नाम बेलागवी जिले के एक ऐतिहासिक तालुका के नाम पर है जिस पर रानी चेन्नम्मा (1778 1829) का शासन था, जिन्होंने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से पहले अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी।
इस क्षेत्र में लिंगायत जाति का है दबदबा
यह मुख्य रूप से एक लिंगायत बहुल क्षेत्र है, उत्तर कन्नड़ जिले को छोड़कर बाकी छह जिलों में लिंगायत जाति का दबदबा है। यह मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई सहित कई वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं का गृह क्षेत्र है। 2018 के विधानसभा चुनावों में इस क्षेत्र की कुल 50 सीटों में से भाजपा ने 30 सीटें जीती थीं, इसके बाद कांग्रेस ने 17, जेडी (एस) ने दो और अन्य (केपीजेपी-शंकर) ने एक सीट जीती थी।
पहले कांग्रेस का था बोलबाला
राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लिंगायत समुदाय द्वारा समर्थित भाजपा इस क्षेत्र में एक प्रमुख पार्टी है, जहां कभी कांग्रेस का बोलबाला था। 1990 के दशक के चुनावों में कांग्रेस इस क्षेत्र में भगवा पार्टी से हार गई थी क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल एक लिंगायत थे, जो एक झटके से उबर रहे थे। उनको तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा बर्खास्त कर दिया गया था। कांग्रेस के इस फैसले ने लिंगायत समुदाय को पार्टी के खिलाफ कर दिया।
2013 में कांग्रेस ने की फिर वापसी
इसके बाद जब इस प्रमुख समुदाय ने एक अन्य लिंगायत नेता भाजपा के बीएस येदियुरप्पा के समर्थन में रैली शुरू की, तो यह क्षेत्र धीरे-धीरे एक दशक से अधिक समय 2013 तक भगवा पार्टी का गढ़ बन गया। हालांकि, कांग्रेस ने 2013 में 50 में से 31 सीटें जीतकर इस क्षेत्र में वापसी की। तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर के साथ येदियुरप्पा के भगवा पार्टी में विभाजन और कर्नाटक जनता पक्ष (केजेपी) के गठन ने पुरानी कांग्रेस पार्टी को वापस उबरने में मदद की थी।
येदियुरप्पा के राजनीति संन्यास का फायदा उठाने की कोशिश में कांग्रेस
बाद में येदियुरप्पा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले पार्टी में वापसी की और केजेपी वापस भाजपा के पाले में आ गई। कांग्रेस 2018 के चुनावों में अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराने में विफल रही, जिससे भाजपा के लिए क्षेत्र में खोई जमीन हासिल करने का मार्ग प्रशस्त हुआ। येदियुरप्पा के चुनावी राजनीति से सेवानिवृत्त होने के साथ कांग्रेस अब फिर से लिंगायतों को पार्टी में वापस लाने की कोशिश कर रही है और इसका मुकाबला करने के लिए भाजपा अपने चुनावी शुभंकर के रूप में अस्सी वर्षीय नेता पर भरोसा कर रही है।
चुनाव से ठीक पहले लिंगायत आरक्षण में दो प्रतिशत की बढ़ोतरी करने के भाजपा सरकार के फैसले के निहितार्थों पर नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि समुदाय के भीतर कुछ समूह इससे ज्यादा आरक्षण मिलने का इंतजार कर रहे थे। एससी, एसटी और ओबीसी के साथ-साथ मुस्लिम भी कित्तूर कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह दोनों ने भाजपा के पक्ष में वोट बटोरने में इस क्षेत्र के महत्व को देखते हुए धारवाड़ और बेलगावी जैसे क्षेत्र के कुछ हिस्सों में बड़े पैमाने पर जनसभाएं और मेगा रोड शो किए हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी पिछले महीने बेलगावी में पार्टी की राज्य इकाई द्वारा आयोजित एक युवा सम्मेलन "युवा क्रांति समावेश" आयोजित किया था।