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300 मीटर जमीन के लिए भारत-चीन जैसे परमाणु देश नहीं करते जंग

Tue, 22 Aug 2017 09:02 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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Indo-China
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भारत के पास इसकी उम्मीद जिंदा है कि चीन के साथ डोकलाम के गतिरोध को लेकर कोई युद्ध नहीं होगा। भारतीय विदेश सेवा के उच्चपदस्थ सूत्र के अनुसार जमीन पर 300 मीटर पीछे हटने के लिए दो देश युद्ध नहीं लड़ते।
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सूत्र का कहना है कि विवाद के निबटारे और गतिरोध को खत्मक करने की पहल जारी है। कूटनीतिक चैनल का इस्तेमाल किया जा रहा है और जल्द ही समस्या के समाधान की उम्मीद है। हालांकि हालात की गंभीरता को देखते हुए भारतीय सैन्य बलो ने चीन की तैयारियों के बाबत हर चुनौती से निबटने की सक्षमता तेज कर दी है।

राजनयिक सूत्रों के मुताबिक जून से लेकर अबतक चीन और भारत के बीच में डोकलाम गतिरोध को दूर करने के कई दौर के प्रयास हुए हैं। इस दौरान चीन ने कई बार युद्ध की धमकी दी है, लेकिन इन सबके बावजूद भारत और चीन के रिश्ते हैं। दोनों देश इसका सम्मान भी करते हैं।  
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युद्ध जैसी संभावना के बारे में पूछे जाने पर सूत्र का कहना है कि  भारत डोकलाम से अपनी फौज को हटाने के लिए तैयार है। बशर्ते चीन अपनी सेना को पीछे लै जाने की गारंटी दे दे। रहा सवाल युद्ध का तो भारत और चीन जैसे संयम वाले देश 300 मीटर जमीन के टुकड़े को लेकर युद्ध नहीं कर सकते।

क्यों नहीं है युद्ध की संभावना

india-china
रक्षा मामलों के जानकार मेजर जनरल(रिटा.) अशोक मेहता का कहना है कि भारत और चीन के बीच में डोकलाम के मुद्दे पर युद्ध नहीं होगा। स्थानीय स्तर का संघर्ष जरूर हो सकता है। लेकिन राजनयिक स्तर के सूत्रों का कहना है कि स्थानीय स्तर के संघर्ष की भी संभावना कम है।

क्योंकि भारत और चीन इसके बाद का अर्थ समझते हैं। भारत और चीन दोनों बड़ी सैन्य शक्ति वाले देश हैं। दोनों देशों के पास पैदल सेना, नौसेना, वायुसेना की मजबूत ताकत है। घातक हथियारों का जखीरा है और परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं।

दोनों देशों के सामरिक रणनीतिकारों को इसका ठीक-ठीक अंदाजा है कि युद्ध की दशा में नफा-नुकसान का स्तर क्या होगा।
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भारत ने बढ़ाया ब्रिक्स का दबाव

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भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शरीक होने को लेकर अभी वह कुछ नहीं सकते। रवीश कुमार की इस अनभिज्ञता के माने हैं। इस बार का ब्रिक्स देशों का शिखर सम्मेलन चीन के श्योमोन शहर में हो रहा है।

रूस की पहल पर भारत, चीन और ब्राजील एक मंच के नीचे आए थे। बाद में इसमें दक्षिण अफ्रीका भी शामिल हुआ। ऐसे में चीन और रूस दोनों के लिए ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन, आपसी सहयोग के खास माने हैं।

रूस और चीन कभी नहीं चाहेंगे कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सहएकता खतरे में पड़े। माना यह जा रहा है कि चीन पर दबाव और रूस पर चीन को डोकलाम गतिरोध में न्यायपूर्ण कदम उठाने के लिए भारत ब्रिक्स में न शरीक होने का प्रस्ताव भेजकर दबाव बना सकता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की टिप्पणी को इसी नजरिए से देखा जा रहा है।

बताते चलें कि डोपसांग(लद्दाख) में 2013 में चीनी घुसपैठ और सैनिकों के टिक जाने के बाद भारत ने इस तरह की कूटनीति का प्रयोग किया था। चीन के शिखर नेता को कुछ दिन बाद भारत दौरे पर आना था।

जबकि चीन के सैनिक डोपसांग में डटे हुए थे। ऐसे में भारत को कहना पड़ा था कि ऐसी दशा में चीन के शिखर नेता का भारत दौरा मुनासिब नहीं होगा। इसके बाद मामले का हल निकल आया था।
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