अमेरिका में 24 घंटे में गोलाबारी की दो घटनाओं ने लोगों को हिलाकर रख दिया है। पहली घटना कल हुई जब सांसदों को बेसबाल के अभ्यास मैच के दौरान गोली मार दी गई। जिसमें कई सांसद घायल हो गए। दूसरी घटना देर रात हुई जिसमें सैन फ्रांसिस्को में हमलावर ने तीन लोगों की हत्या कर खुद को भी गोली से उड़ा दिया। इस घटना के बाद सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर अमेरिका में लोगों को इतनी आसानी से हथियार उपलब्ध कैसे हो रहे हैं जिससे वो किसी को भी निशाना बना दे रहे हैं? ये कोई पहली घटना नहीं है जब इतने अत्याधुनिक हथियारों से हमलावरों ने सामने वाले पर हमला कर दिया। इसको लेकर अमेरिका में लंबे समय से चिंता जताई जा रही है।
पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जनवरी महीने में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान इस मुद्दे पर भावुक हो उठे थे। उनकी आंखों में आएं आंसू शायद बंदूक नियंत्रण पर नाकामी से उपजी निराशा के कारण थे। देश में लगातार गोलीबारी की घटनाओं के बावजूद बंदूकों पर नियंत्रण के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा था, लेकिन अपेक्षित सफलता न मिलने से वह अपने पद के अंतिम दिनों में काफी निराश दिखे।
हालांकि अमेरिका में इस तरह आसानी से हथियार उपलब्ध होने के लिए अक्सर नेशनल रायफ़ल एसोसिएशन (NRA) को ज़िम्मेदार माना जाता है। एनआरए ने बंदूकों के पक्ष में जबर्दस्त खेमेबाजजी कर रखी है और यह जमीनी स्तर पर बेहद प्रभावशाली है। इस मुद्दे पर बीबीसी ने कुछ समय पहले कई विशेषज्ञों से बात की थी जिसमें यह जानने का प्रयास किया गया कि एनआरए के पास इतनी ताकत कैसे आई कि एक राष्ट्रपति को भी असहाय हो जाना पड़ा।
वारेन कासिडी, एनआरए के पूर्व कार्यकारी उपाध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी बताते हैं कि 1871 में गृहयुद्ध के तुरंत बाद एनआरए बनी। 20वीं सदी के शुरुआती आधे हिस्से तक ये सिर्फ़ निशानेबाजों का संगठन माना जाता था जो एक तरह से शिकारियों और संग्राहकों के लिए घर जैसा था।
पहले जैक केनेडी, फिर मार्टिन लूथर किंग और बॉबी केनेडी की हत्या के बाद अमरीका में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गईं। उसके बाद सचमुच एक राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत हुई।
कासिडी कहते हैं कि हमें सक्रिय होना पड़ा क्योंकि कानून की मौजूदगी दिखने लगी थी। इसके अलावा 1968 के बंदूक नियंत्रण कानून के तहत ज्यादा लाइसेंसी डीलरों की जरूरत थी ताकि हथियार बेचे जा सकें। सुनने में तो यह सही लगता है लेकिन इसने कानून का पालन करने वालों की मुसीबतें बढ़ा दीं।’’
एनआरए के कुछ निदेशक ऐसे थे जो राजनीतिक संकट के खिलाफ बोर्ड के संयत रुख से खुश नहीं थे। कुछ ने खुलकर विरोध किया और कुछ ने तो राजनीति में अपने हाथ भी गंदे कर लिए। इसके बाद 1977 में सिनसिनाटी विद्रोह हुआ, तब हम अपने एजेंडे पर आए और सालाना बैठक में हमने अपने प्रस्ताव रखे। हममें से कई लोग कहेंगे कि उस वक्त हम एक राजनीतिक संगठन बन गए थे।