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जानिए, अमेरिका में क्यों बढ़ीं फायरिंग की घटनाएं, कैसे इतनी आसानी से मिल जाते हैं हथियार?

Thu, 15 Jun 2017 02:24 PM IST
amarujala.com- Written by : हरेन्द्र सिंह मोरल
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अमेरिका में 24 घंटे में गोलाबारी की दो घटनाओं ने लोगों को हिलाकर रख दिया है। पहली घटना कल हुई जब सांसदों को बेसबाल के अभ्यास मैच के दौरान गोली मार दी गई। जिसमें कई सांसद घायल हो गए। दूसरी घटना देर रात हुई जिसमें सैन फ्रांसिस्को में हमलावर ने तीन लोगों की हत्या कर खुद को भी गोली से उड़ा दिया। इस घटना के बाद सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर अमेरिका में लोगों को इतनी आसानी से हथियार उपलब्‍ध कैसे हो रहे हैं जिससे वो किसी को भी निशाना बना दे रहे हैं? ये कोई पहली घटना नहीं है जब इतने अत्याधुनिक हथियारों से हमलावरों ने सामने वाले पर हमला कर दिया। इसको लेकर अमेरिका में लंबे समय से चिंता जताई जा रही है।
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पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जनवरी महीने में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान इस मुद्दे पर भावुक हो उठे थे। उनकी आंखों में आएं आंसू शायद बंदूक नियंत्रण पर नाकामी से उपजी निराशा के कारण थे। देश में लगातार गोलीबारी की घटनाओं के बावजूद बंदूकों पर नियंत्रण के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा था, लेकिन अपेक्षित सफलता न मिलने से वह अपने पद के अंतिम दिनों में काफी निराश दिखे।

हालांकि अमेरिका में इस तरह आसानी से हथियार उपलब्‍ध होने के लिए अक्सर नेशनल रायफ़ल एसोसिएशन (NRA) को ज़िम्मेदार माना जाता है। एनआरए ने बंदूकों के पक्ष में जबर्दस्त खेमेबाजजी कर रखी है और यह जमीनी स्तर पर बेहद प्रभावशाली है। इस मुद्दे पर बीबीसी ने कुछ समय पहले कई विशेषज्ञों से बात की थी जिसमें यह जानने का प्रयास किया गया कि एनआरए के पास इतनी ताकत कैसे आई कि एक राष्ट्रपति को भी असहाय हो जाना पड़ा। 
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वारेन कासिडी, एनआरए के पूर्व कार्यकारी उपाध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी बताते हैं कि 1871 में गृहयुद्ध के तुरंत बाद एनआरए बनी। 20वीं सदी के शुरुआती आधे हिस्से तक ये सिर्फ़ निशानेबाजों का संगठन माना जाता था जो एक तरह से शिकारियों और संग्राहकों के लिए घर जैसा था।

पहले जैक केनेडी, फिर मार्टिन लूथर किंग और बॉबी केनेडी की हत्या के बाद अमरीका में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गईं। उसके बाद सचमुच एक राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत हुई।

कासिडी कहते हैं कि हमें सक्रिय होना पड़ा क्योंकि कानून की मौजूदगी दिखने लगी थी। इसके अलावा 1968 के बंदूक नियंत्रण कानून के तहत ज्यादा लाइसेंसी डीलरों की जरूरत थी ताकि हथियार बेचे जा सकें। सुनने में तो यह सही लगता है लेकिन इसने कानून का पालन करने वालों की मुसीबतें बढ़ा दीं।’’

एनआरए के कुछ निदेशक ऐसे थे जो राजनीतिक संकट के खिलाफ बोर्ड के संयत रुख से खुश नहीं थे। कुछ ने खुलकर विरोध किया और कुछ ने तो राजनीति में अपने हाथ भी गंदे कर लिए। इसके बाद 1977 में सिनसिनाटी विद्रोह हुआ, तब हम अपने एजेंडे पर आए और सालाना बैठक में हमने अपने प्रस्ताव रखे। हममें से कई लोग कहेंगे कि उस वक्त हम एक राजनीतिक संगठन बन गए थे।

आज एनआरए युवा शूटरों के लिए ट्रेनिंग की बड़ी जगह है और शिकार की परंपरा को बचा रहा है, लेकिन साथ ही इसके पास बड़ी राजनीतिक पहुंच भी है। राज्यों के स्थानीय संघ हमारी बड़ी ताक़त हैं। जैसे कैलिफ़ोर्निया रायफ़ल एंड पिस्टल एसोसिएशन, मास राइफ़ल एसोसिएशन, गन ओनर्स एक्शन लीग आदि। ये संगठन पिछले 50 सालों से अपनी मर्ज़ी से काम कर रहे हैं, हम अपने प्रतिनिधि भेजते हैं और चुनाव के लिए पैसा जुटाने में मदद करते हैं।

बंदूक रखने के अधिकार के मामले में उनके रुख के आधार पर स्थानीय चुनावों के उम्मीदवारों को हम ग्रेड देते हैं। उसके बाद उनके पूरे कार्यकाल पर हमारी नजर होती है। अब वो चाहे सिटी काउंसलर, मेयर या गवर्नर हों या फिर कांग्रेस के लिए लड़ रहे हों।

हम अपना बहुत सा पैसा वोटरों पर खर्च करते हैं। आप सीनेट में पहुँचे किसी भी उम्मीदवार से पूछ सकते हैं कि एनआरए ने उनकी कैसे मदद की। उन्हें हमारे शहर, हमारे राज्य में वोट मिलता है और यही हमारे काम करने का तरीका है। 
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रोजर विलियम यूनिवर्सिटी में लॉ प्रोफेसर प्रोफ़ेसर कार्ल बोगस बताते हैं कि दूसरे संशोधन में साफ कहा गया है। एक नियमित नागरिक सेना स्वतंत्र राज्य की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है। लोगों के हथियार रखने के अधिकार का उल्लंघन नहीं होना चाहिए, और ऐसा कहने का मतलब यह है कि अगर संघीय सरकार नागरिक सेना को हथियार नहीं देती तो लोग यह काम कर सकते हैं।

दूसरे संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ़ तीन केस दर्ज हुए, सबमें माना गया कि दूसरा संशोधन नागरिक सेना से जुड़ा है और सामूहिक अधिकार देता है न कि व्यक्तिगत। 1960 तक माना जाता रहा कि मामला सुलझ गया है।

एनआरए ने इसे बदलने के लिए बड़ा अभियान चलाया, अमरीका की क़ानून समीक्षाओं में उन्होंने खूब लेख लिखवाए। इनमें कहा गया कि दूसरे संशोधन को व्यक्तिगत अधिकार (हथियार रखने) की मंज़ूरी देनी चाहिए।

उन्होंने 2008 में एक बड़ी जंग जीत ली जब द डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया बनाम हेलर केस में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार कहा कि दूसरा संशोधन व्यक्तिगत अधिकार की मंजूरी देता है।

सुप्रीम कोर्ट में नौ जजों की बेंच में जज विचारों के आधार पर दो खेमों में बंटे थे। रुढ़िवादियों ने व्यक्तिगत अधिकारों को हां कहा जबकि उदारवादियों ने सामूहिक अधिकारों की बात की। एनआरए ने व्यक्तिगत अधिकारों के जिस विचार को प्रचारित किया वो आधुनिक रुढ़िवादी आंदोलन बन गया।

बंदूक़ों पर नियंत्रण में राजनीतिक बाधा अमरीकी वोटर नहीं हैं। शायद 80 या 90 फ़ीसदी अमरीकी ज़्यादा सख़्त कानूनों को हां कहेंगे। लेकिन महज़ एक दो फ़ीसदी वोटरों के एक बहुत छोटे से तबके के तीव्र विरोध ने इसे मुद्दा बना रखा है। ये लोग कभी भी बंदूक़ों पर नियंत्रण की बात करने वाले उम्मीदवार को वोट नहीं देंगे।
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