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ओडिशा के गांव से सीखें: बबेइजोड़ा मिसाल; सफाई के लिए बड़े बजट की नहीं, ईमानदार सोच और दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत

Mon, 14 Sep 2026 12:00 PM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला रिसर्च।

सार

ओडिशा के ग्रामीणों ने बताया, सफाई के लिए बड़े बजट की नहीं, ईमानदार सोच और दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत। 15 साल से कचरा-प्लास्टिक मुक्त है मयूरभंज का गांव बबेइजोड़ा। जानिए कैसे मिली सफलता।
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ओडिशा के मयूरभंज का स्वच्छ गांव बबेइजोड़ा - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एआई ग्राफिक्स
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विस्तार
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ओडिशा के मयूरभंज जिले में स्थितएक छोटा सा आदिवासी गांव बबेइजोड़ा अपनी अनूठी स्वच्छता प्रणाली के कारण देश भर के पर्यटकों के लिए एक बड़ा आकर्षण बन गया है। यह गांव पिछले 15 साल से कचरा व प्लास्टिक मुक्त बना हुआ है। यह सुंदर और हरा-भरा गांव राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-49 से महज 2 किलोमीटर की दूरी पर बिशोई ब्लॉक में स्थित है, जो बारिपदा से लगभग 70 किलोमीटर दूर है।

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इससे साबित होता है कि यह कोई अस्थायी अभियान नहीं बल्कि ग्रामीणों की जीवनशैली का हिस्सा है। ग्रामीणों ने यह दिखा दिया है कि स्वच्छता के लिए किसी बड़े बजट की नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी की भावना की जरूरत होती है। पूरे गांव में सड़कें साफ-सुथरी हैं और कहीं भी कूड़ा-कचरा नहीं बिखरा है। यहां की बेदाग सड़कें स्वच्छता के प्रति समर्पित समुदाय का परिणाम हैं, जहां हर निवासी अपने आसपास को साफ रखने में सक्रिय रूप से भाग लेता है।

महिलाएं दिन में तीन बार साफ करती हैं सड़कें
गांव में गंदगी फैलाने, सार्वजनिक रूप से थूकने, धूम्रपान करने और प्लास्टिक का उपयोग करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। गांव की महिलाएं दिन में तीन बार सड़कों और गलियों की सफाई करती हैं। हर 30 मीटर पर बांस के डस्टबिन रखे गए हैं। युवा स्वयंसेवक रोजाना कचरा इकट्ठा करते हैं और उसे जैविक खाद (कंपोस्ट) में बदलते हैं।
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सीसीटीवी से रखी जाती है नजर
स्वच्छता का पालन सख्ती से इसलिए भी हो रहा है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले पर्यटकों और स्थानीय लोगों पर नजर रखने के लिए गांव में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। गंदगी फैलाने वालों पर जुर्माना लगाया जाता है। इस गांव में मुख्य रूप से ओडिशा के अलग-अलग हिस्सों, पड़ोसी राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और झारखंड, तथा भारत के अन्य राज्यों से घरेलू पर्यटक पहुंच रहे हैं। इतना ही नहीं गांव के मिट्टी के घरों की दीवारों पर वहां की महिलाओं द्वारा प्राकृतिक रंगों (मिट्टी, फूलों, पत्थरों और पेड़ों की छाल) से खूबसूरत पारंपरिक चित्रकारी की गई है। स्वच्छता आंदोलन की शुरुआत लगभग 15 साल पहले एक स्थानीय आदिवासी शिक्षक मधुसूदन मरांडी ने की थी।

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