बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि महाराष्ट्र का काला जादू कानून केवल हानिकारक प्रथाओं को रोकने के लिए बनाया गया है, लेकिन यह वैध धार्मिक परंपराओं पर लागू नहीं होता। गुजरात के रामेश मोडक उर्फ शिवकृपानंद स्वामी पर काला जादू फैलाने का आरोप था, लेकिन निचली अदालत ने उन्हें इस मामले से बरी कर दिया था। इस फैसले को चुनौती दी गई थी, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे बरकरार रखा।
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति आर. एन. लड्डा की पीठ ने कहा कि 'काला जादू कानून' 2013 में इसलिए बनाया गया था ताकि मानव बलि, धोखाधड़ी वाले अनुष्ठान और मानसिक शोषण जैसी हानिकारक प्रथाओं पर रोक लगाई जा सके। लेकिन यह वैध धार्मिक शिक्षाओं, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक या कलात्मक अभिव्यक्तियों पर लागू नहीं होता।
क्या है पूरा मामला?
पुणे के रहने वाले रोहन कुलकर्णी ने 2014 में शिकायत दर्ज करवाई थी कि रामेश मोडक और उनके सहयोगी नरेंद्र पाटिल ने कार्यशालाओं के जरिए धोखाधड़ी की। उन्होंने दावा किया कि रामेश मोडक काला जादू और अमानवीय अनुष्ठानों को बढ़ावा देते थे। रोहन कुलकर्णी के अनुसार, उन्होंने 2012 में एक कार्यशाला में हिस्सा लिया, जहां रामेश मोडक ने अलौकिक शक्तियों का दावा किया। इसके बाद रोहन कुलकर्णी गुजरात के नवसारी गए लेकिन रामेश मोडक से मुलाकात नहीं हो पाई।
2013 में उन्होंने पुणे में एक और कार्यशाला में हिस्सा लिया, जहां रामेश मोडक ने कथित रूप से संवाद किया। वहां एक सीडी भी चलाई गई, जिसे आशीर्वाद प्राप्त बताया गया और 250 रुपये में बेचा गया। बाद में रोहन कुलकर्णी ने 45 दिन का ध्यान कोर्स किया, जिससे उन्हें मानसिक और शारीरिक परेशानी होने लगी।
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निचली अदालत का फैसला
2020 में निचली अदालत ने कहा कि रोहन कुलकर्णी की शिकायत में काला जादू कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता, इसलिए रामेश मोडक को बरी कर दिया गया। हाई कोर्ट ने भी इस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया और कहा कि रामेश मोडक ने स्वयं कोई कार्यशाला आयोजित नहीं की थी, इसलिए उन पर मुकदमा नहीं चल सकता।