अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध घोषित करने वाली धारा 377 पर सरकार ने पहली बार अपना रुख साफ किया है। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि समलैंगिक संबंध बनाना लोगों की व्यक्तिगत पसंद हो सकती है। बता दें कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने धारा-377 की वैधता को चुनौती वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक साक्षात्कार में रविशंकर प्रसाद ने कहा कि समाज अब बदलाव की ओर अग्रसर है और धारा 377 पर सरकार का रूख भी उसी को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यौन वरीयता व्यक्तिगत पसंद का मामला हो सकता है, तो इसे अपराध की श्रेणी से क्यों नहीं हटा दिया जाए? इसके अलावा समलैंगिक विवाह जैसे अन्य मुद्दे अलग मामले हैं। यह पूरी तरह से मानवीय मुद्दा है। यह भारतीयों के विचारों में हो रहे बदलावों को दिखाता है।
बता दें कि इससे पहले केंद्र सरकार ने समलैंगिकता को अपराध करार देने वाले प्रावधान (धारा-377) को निरस्त करने की गुहार वाली याचिकाओं का विरोध नहीं करने का निर्णय लिया था। सरकार ने इस मसले को सुप्रीम कोर्ट के विवेक पर छोड़ दिया था।
सरकार की ओर से तुषार मेहता ने कहा था कि धारा-377 की वैधता का मसला अदालत के विवेक पर छोड़ती है लेकिन शादी, संपत्ति का अधिकार और विरासत आदि के मसले पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। अगर अदालत एलजीबीटी समुदाय के अन्य अधिकारों पर विचार करेगी तो सरकार विस्तृत हलफनामा दायर करेगी।
रविशंकर प्रसाद ने इसके अलावा मॉब लिंचिंग को लेकर भी कहा कि हम भीड़ द्वारा की जा रही हत्याओं की घोर निंदा करते हैं। हम इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के सुझावों पर विचार कर रहे हैं। कानून में ऐसे कई प्रावधान हैं जो इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाते हैं और इसका इसका इस्तेमाल जरूर होना चाहिए।