अंतरिम बजट बनाम पूर्ण बजट का बवाल
आम तौर पर आम चुनाव से ठीक पहले सरकारें अंतरिम बजट पेश कर नई सरकार के गठन तक जरूरी अनुदान मांगे स्वीकृत कराती रही हैं। इसमें भविष्य के लिए कोई भी घोषणा करने से सरकारें बचती रही हैं। यही कारण है कि इसे अंतरिम बजट कहा जाता है। मगर इस बार सरकार की योजना किसान, मध्यम वर्ग, व्यापारी सहित कई वर्गों के लिए कई अहम घोषणा करने की है। सरकार केसूत्रों का दावा है कि संविधान में कहीं भी अंतरिम बजट का कोई उल्लेख नहीं है। फिर जब नई सरकार को पुरानी सरकारों के फैसलों पर रोक का अधिकार है तो इस पर बिना वजह विवाद खड़ा किया जा रहा है। जबकि विपक्ष का कहना है कि सरकार पूर्ण बजट पेश करने की स्थिति में ही ऐसी घोषणा कर सकती है। यह संवैधानिक और परंपरा दोनों ही दृष्टि से अनुचित है।
विवि नियुक्ति केलिए नए रोस्टर पर बवाल
सत्र में विश्वविद्यालायों में नियुक्ति केलिए विभाग को ही मानक माने जाने संबंधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी के बाद इस विवाद की छाया सत्र पर पडनी तय है। विपक्ष ही नहीं सरकार के सहयोगी दलों लोजपा, अपना दल, आरपीआई ने सरकार से संविधान संशोधन के जरिए इस फैसले पर रोक लगाने की मांग की है। इनका आरोप है कि इस फैसले के कारण नियुक्ति में आरक्षण के सिद्घांत का पालन नहीं होगा। प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी इस मामले में बीच का रास्ता निकालने के लिए लगातार माथापच्ची की है। पीएमओ ने संविधान संशोधन के विकल्प पर भी विचार किया है।
तीन तलाक-नागरिकता बिल पर भी हंगामा तय
तीन तलाक मामले में दो बार अध्यादेश जारी कर चुकी सरकार की योजना इससे जुड़े बिल के साथ ही नागरिकता संशोधन बिल को इस सत्र में फिर से पेश करने की है। ये दोनों बिल विपक्ष की आपत्तियों केकारण बीते सत्रों में कानूनी जामा पहनने के लिए जरूरी राज्यसभा की देहड़ी नहीं लांघ पाए। सरकार की योजना इन बिलों के जरिए अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं और बहुसंख्यक समाज को साधने की है।