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कुरुक्षेत्र : दिल्ली में तनातनी, श्रीनगर में धमाका और भाजपा के लिए दोहरी चुनौती

Wed, 20 Jun 2018 01:40 PM IST
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला
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तनातनी दिल्ली में थी लेकिन धमाका श्रीनगर में हुआ। पिछले नौ दिन से दिल्ली के उपराज्यपाल निवास में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पूरे मंत्रिमंडल के साथ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे थे और दो मंत्रियों को तबीयत बिगड़ने की वजह से अस्पताल भी जाना पड़ा, लेकिन केंद्र सरकार चुपचाप तमाशा देख रही थी। भाजपा के सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेता दिल्ली सरकार की बर्खास्तगी तक की मांग कर रहे थे, लेकिन गाज गिरी जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की सरकार पर।
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अचानक मंगलवार की सुबह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मिले और दोपहर बाद महबूबा सरकार से भाजपा के अलग होने और समर्थन वापसी का एलाना हो गया। दिलचस्प बात यह भी रही कि इसी दिन शाम को केजरीवाल ने भी अपना धरना उठा लिया क्योंकि उनकी अपील पर दिल्ली सरकार के अधिकारियों ने मंत्रियों की बैठकों में आना स्वीकार कर लिया था।

यानी मंगलवार को जब दिल्ली की जनता ने राहत की सांस ली तो दूसरी तरफ जम्मू और कश्मीर में राजनीतिक अनिश्चतता के बादल गहरा गए। यूं तो दोनों घटनाओं में प्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं है और दोनों का एक ही दिन घटित होना महज संयोग ही माना जा सकता है। लेकिन जिस तरह दुनिया के अलग अलग हिस्सों में होने वाली पर्यावरण से छेड़छाड़ पूरे विश्व के वातावरण को प्रभावित करती है उसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली सियासी उथल पुथल पूरे सियासी वातावरण पर असर डालती है।
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इसलिए बिहार के अररिया से लेकर गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा उपचुनाव की नतीजों, कर्नाटक की सियासी उठापटक, अरविंद केजरीवाल के धरने को चार विपक्षी मुख्यमंत्रियों का समर्थन और जम्मू और कश्मीर में भाजपा पीडीपी की कट्टी को भी अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता है। दरअसल कश्मीर को लेकर भाजपा ने जो यह बड़ा फैसला लिया है इसे लोकसभा चुनावों खासकर कैराना के नतीजों और विपक्ष की गोलबंदी का जवाब माना जाना चाहिए।

2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा ने भले ही विकास और सुशासन का नारा देकर जीता हो लेकिन उस चुनावी जीत की इमारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आक्रामक हिंदुत्व की सीमेंट और नरेंद्र मोदी और अमित शाह द्वारा बिछाई गई जातीय समीकरणों की ईंटों की बुनियाद थी। लेकिन सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ अपनी वैश्विक छवि बनाने के लिए कट्टर भाजपा संघ विरोधी मुस्लिम जमात के एक बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ने के लिए कुछ बड़े फैसले लिए। इनमें सबसे बड़ा फैसला अपनी धुर विरोधी पीडीपी के साथ जम्मू कश्मीर में गठबंधन सरकार बनाने का था।

इस फैसले के जरिए पहली बार भाजपा ने देश के सबसे संवेदनशील और मुस्लिम बहुल राज्य में सत्ता में सीधी हिस्सेदारी पाई तो साथ ही यह संदेश पूरे देश और दुनिया को दिया कि कश्मीर में अमन बहाली और देश हित में भाजपा और मोदी को पीडीपी जैसी कश्मीरी मुसलमानों की नुमाइंदगी करने वाली पार्टी से भी परहेज नहीं है। भाजपा और संघ ने इस गठबंधन का इस्तेमाल पूरे देश में मुसलमानों को यह संदेश देने के लिए भी किया उनके खिलाफ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भाजपा विरोधी दलों द्वारा किए जाने वाले दुष्प्रचार में कोई दम नहीं है।

साथ ही केंद्र सरकार ने एक साथ तीन तलाक कानून को लेकर जिस तरह का स्पष्ट रुख रखा, उससे उसे उम्मीद थी कि उदारवादी मुसलमानों और मुस्लिम महिलाओं के बड़े तबके का समर्थन उसे जरूर मिलेगा। मोदी और भाजपा इसे अपने एक नए जनाधार वर्ग के रूप में देख रहे थे। यही वजह थी कि जम्मू कश्मीर में लगातार पत्थरबाजी, आतंकवादी हमलों और महबूबा मुफ्ती के तमाम दबावों के बावजूद करीब साढ़े तीन साल से भी ज्यादा समय से भाजपा इस गठबंधन को चला रही थी।

इसके लिए उसे देश में अपने मूल हिंदुत्ववादी जनाधार के गुस्से का भी शिकार होना पड़ा, क्योंकि न सिर्फ भाजपा पर आतंकवाद के मुद्दे पर समझौते और नरमी के आरोप लग रहे थे, बल्कि भाजपा के पूर्ववर्ती जनसंघ के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कश्मीर पर स्थापित नीति से भी अलग होना पड़ा था। लेकिन इसी दौर में सोशल मीडिया में कथित हिंदुत्ववादियों के मुस्लिम विरोधी प्रचार अभियान और सड़कों पर गोरक्षा के नाम पर किए जाने वाले पागलपन और वहशियाना हरकतों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार के इन कदमों पर पानी फेर दिया और मुसलमानों में असुरक्षा का भाव घर करता गया, जिसे उन्होंने मौका मिलने पर कभी बिहार तो कभी दिल्ली तो कभी उपचुनावों में जाहिर भी किया।

दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार तो असम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और त्रिपुरा की भारी जीत से ढंक गई, लेकिन गुजरात में कांग्रेस के साथ कांटे की टक्कर में हारते हारते जीतना और कर्नाटक में कांग्रेस जद (एस) के साथ तिकोने मुकाबले के बावजूद जीतते जीतते पाला छूने से पहले ही सांस उखड़ जाने से भाजपा नेतृत्व प्रधानमंत्री और संघ शीर्ष सभी चिंतित हो गए। रही सही कसर लोकसभा उपचुनावों में लगातार मिलने वाली हार ने पूरी कर दी।

पहले पंजाब में गुरुदासपुर में कांग्रेस के सुनील जाखड़ की भाजपा उम्मीवार पर भारी जीत, फिर बिहार के अररिया में जद (यू) से गठबंधन के बावजूद भाजपा उम्मीदवार की जेल में बंद लाल प्रसाद यादव की पार्टी राजद के हाथों भारी मतों से हार, उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र गोरखपुर और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की सीट फूलपुर में सपा के हाथों मिली पराजय, इसके पहले मध्य प्रदेश और राजस्थान के लोकसभा उपचुनावों में भाजपा की हार और हाल ही में उत्तर प्रदेश के कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा चुनाव और महाराष्ट्र के गोंदिया लोकसभा उपचुनाव में एनसीपी की जीत से भाजपा को 2019 लोकसभा चुनावों में अपनी नैया मझधार में फंसती नजर आने लगी।

लोकलुभावन नारों और आयोजनों में सिद्धहस्त भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने फौरन समर्थन के लिए संपर्क अभियान शुरु कर दिया और खुद 50 जाने माने लोगों से मिलने के लिए निजी तौर पर गए। शाह की तर्ज पर भाजपा के दूसरे नेता भी इसमें जुट गए। इस संपर्क समर्थन अभियान में भाजपा नेता जहां गए वहां उन्हें उनकी कश्मीर नीति पर जो स्वर सुनाई दिए उससे उनके कान और खड़े हो गए।

उधर दूसरी तरफ कर्नाटक में कांग्रेस जद (एस) गठबंधन, बेंगलूरु में विपक्षी नेताओं के जमावड़े, उत्तर प्रदेश में सपा बसपा के गठबंधन की ओर बढ़ते कदम, एनडीए के सहयोगी दलों में शुरु हुई खींचतान से भाजपा पर दबाव और बढ़ गया। रही सही कसर दिल्ली में सरकार के साथ आईएएस अफसरों के असहयोग के विरोध में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के धरनास्त्र ने और पूरी कर दी। केजरीवाल के समर्थन में जिस तरह पहले चार मुख्यमंत्रियों ममता बनर्जी, एन.चंद्रबाबू नायडू, एच.डी कुमारस्वामी और पिन्नारी विजयन के खुल कर आने और फिर अन्य विपक्षी दलों के समर्थन ने केजरीवाल के धरने को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोध का प्रतीक बना दिया।

भाजपा पहले से ही कश्मीर को लेकर तमाम आरोपों, आलोचनाओं और विपक्षी हमलों के साथ साथ सहयोगी पीडीपी के दबाव से जूझ रही थी, इन सारी राजनीतिक घटनाओं ने उस पर दबाव और बढा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी सख्त नेता की छवि, भाजपा को अपना हिंदुत्ववादी जनाधार और संघ को अपना प्रखर राष्ट्रवादी विचार दरकता हुआ नजर आया। उपचुनावों के नतीजों खासकर कैराना जो 2013 के मुजफ्फनगर दंगों के दौरान संघ और भाजपा की हिंदुत्व ध्रुवीकरण राजनीति की नई प्रयोगशाला के केंद्र में था, की हार से साफ हो गया कि मुसलमानों का भाजपा विरोध तो जस का तस है, उसके हिंदू मतदाता भी उससे दूर हो चले हैं। इसलिए अब पार्टी के पास वापस अपने हिंदू ध्रुवीकरण की राजनीति के पास वापस लौटने के अलावा कोई और चारा नहीं है।
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इसके लिए कश्मीर से बेहतर कोई और जरिया नहीं हो सकता था जहां आतंकवाद और पाकिस्तान विरोध के काकटेल के जरिए शेष भारत में भाजपा और संघ फिर से हिंदुत्व की धार को गरम करके खोई जमीन पाई जा सकती है। आतंकवादियों की हरकतों ने उसे जल्दी ही मौका भी दे दिया। जब केंद्र सरकार मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के संघर्ष विराम को बढाने के सुझाव पर विचार करने की बात कह रही थी तभी ईद के दिन पत्रकार शुजात बुखारी की श्रीनगर में हत्या और सेना के जवान औरंगजेब को अगवा करके मार डालने की आतंकवादी घटनाओं ने भाजपा को समर्थन वापसी और राज्यपाल शासन का आधार दे दिया।

लेकिन अब भाजपा की जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ गई है। राज्यपाल शासन का मतलब सीधे केंद्र सरकार का शासन। अब कश्मीर में किसी भी तरह की गड़बड़ी की सीधी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होगी। साथ ही अब केंद्र सरकार को कश्मीर में आतंकवादियों से निबटने की पूरी छूट भी होगी क्योंकि राज्य प्रशासन तंत्र पूरी तरह राज्यपाल के अधीन होगा। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि कश्मीर में शांति बहाली करके वहां राजनीतिक प्रक्रिया जल्दी से जल्दी शुरु कराई जाए, लेकिन पाकिस्तान और उसकी शह पर पलने वाले आतंकवादी एसा जल्दी होने देंगे यह यक्ष प्रश्न है।

साथ ही भाजपा अगर कश्मीर का इस्तेमाल शेष भारत में अपने चुनावी फायदे के लिए करना चाहेगी तो उससे कश्मीर में अमन का रास्ता और दूर हो सकता है। इसलिए बेहतर होगा कि भाजपा कश्मीर में ईमानदारी से अमन बहाली का हर संभव प्रयास करे। जहां गोली की जरूरत हो वहां गोली और जहां बोली की जरुरत हो वहां बोली को तरजीह दे। कश्मीर को सियासत की प्रयोगशाला बनाने की बजाय अगर उसे अमन और चैन की घाटी बनाने में केंद्र सरकार कामयाब होती है तो उससे देश कश्मीर और भाजपा सबका भला होगा। यही भाजपा की असली चुनौती है कि कैसे कश्मीर का सियासी इस्तेमाल किए बिना वह इस अवसर को लाभ का अवसर बनाती है।
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