तनातनी दिल्ली में थी लेकिन धमाका श्रीनगर में हुआ। पिछले नौ दिन से दिल्ली के उपराज्यपाल निवास में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पूरे मंत्रिमंडल के साथ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे थे और दो मंत्रियों को तबीयत बिगड़ने की वजह से अस्पताल भी जाना पड़ा, लेकिन केंद्र सरकार चुपचाप तमाशा देख रही थी। भाजपा के सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेता दिल्ली सरकार की बर्खास्तगी तक की मांग कर रहे थे, लेकिन गाज गिरी जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की सरकार पर।
अचानक मंगलवार की सुबह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मिले और दोपहर बाद महबूबा सरकार से भाजपा के अलग होने और समर्थन वापसी का एलाना हो गया। दिलचस्प बात यह भी रही कि इसी दिन शाम को केजरीवाल ने भी अपना धरना उठा लिया क्योंकि उनकी अपील पर दिल्ली सरकार के अधिकारियों ने मंत्रियों की बैठकों में आना स्वीकार कर लिया था।
यानी मंगलवार को जब दिल्ली की जनता ने राहत की सांस ली तो दूसरी तरफ जम्मू और कश्मीर में राजनीतिक अनिश्चतता के बादल गहरा गए। यूं तो दोनों घटनाओं में प्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं है और दोनों का एक ही दिन घटित होना महज संयोग ही माना जा सकता है। लेकिन जिस तरह दुनिया के अलग अलग हिस्सों में होने वाली पर्यावरण से छेड़छाड़ पूरे विश्व के वातावरण को प्रभावित करती है उसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली सियासी उथल पुथल पूरे सियासी वातावरण पर असर डालती है।
इसलिए बिहार के अररिया से लेकर गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा उपचुनाव की नतीजों, कर्नाटक की सियासी उठापटक, अरविंद केजरीवाल के धरने को चार विपक्षी मुख्यमंत्रियों का समर्थन और जम्मू और कश्मीर में भाजपा पीडीपी की कट्टी को भी अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता है। दरअसल कश्मीर को लेकर भाजपा ने जो यह बड़ा फैसला लिया है इसे लोकसभा चुनावों खासकर कैराना के नतीजों और विपक्ष की गोलबंदी का जवाब माना जाना चाहिए।
2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा ने भले ही विकास और सुशासन का नारा देकर जीता हो लेकिन उस चुनावी जीत की इमारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आक्रामक हिंदुत्व की सीमेंट और नरेंद्र मोदी और अमित शाह द्वारा बिछाई गई जातीय समीकरणों की ईंटों की बुनियाद थी। लेकिन सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ अपनी वैश्विक छवि बनाने के लिए कट्टर भाजपा संघ विरोधी मुस्लिम जमात के एक बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ने के लिए कुछ बड़े फैसले लिए। इनमें सबसे बड़ा फैसला अपनी धुर विरोधी पीडीपी के साथ जम्मू कश्मीर में गठबंधन सरकार बनाने का था।
इस फैसले के जरिए पहली बार भाजपा ने देश के सबसे संवेदनशील और मुस्लिम बहुल राज्य में सत्ता में सीधी हिस्सेदारी पाई तो साथ ही यह संदेश पूरे देश और दुनिया को दिया कि कश्मीर में अमन बहाली और देश हित में भाजपा और मोदी को पीडीपी जैसी कश्मीरी मुसलमानों की नुमाइंदगी करने वाली पार्टी से भी परहेज नहीं है। भाजपा और संघ ने इस गठबंधन का इस्तेमाल पूरे देश में मुसलमानों को यह संदेश देने के लिए भी किया उनके खिलाफ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भाजपा विरोधी दलों द्वारा किए जाने वाले दुष्प्रचार में कोई दम नहीं है।
साथ ही केंद्र सरकार ने एक साथ तीन तलाक कानून को लेकर जिस तरह का स्पष्ट रुख रखा, उससे उसे उम्मीद थी कि उदारवादी मुसलमानों और मुस्लिम महिलाओं के बड़े तबके का समर्थन उसे जरूर मिलेगा। मोदी और भाजपा इसे अपने एक नए जनाधार वर्ग के रूप में देख रहे थे। यही वजह थी कि जम्मू कश्मीर में लगातार पत्थरबाजी, आतंकवादी हमलों और महबूबा मुफ्ती के तमाम दबावों के बावजूद करीब साढ़े तीन साल से भी ज्यादा समय से भाजपा इस गठबंधन को चला रही थी।