फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कुरुक्षेत्र : दलबदल का नया मॉडल और अमेठी का सियासी गड़बड़झाला

Tue, 30 Jul 2019 09:38 PM IST
विनोद अग्निहोत्री विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली
विज्ञापन
संजय सिंह ने राज्यसभा से इस्तीफा दिया - फोटो : PTI
विज्ञापन

कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य डॉ.संजय सिंह का पार्टी और राज्यसभा से इस्तीफा बिना चुनाव के संसद के उच्च सदन में अपनी ताकत बढ़ाने की भाजपा रणनीति दलबदल का एक नया मॉडल है। संजय सिंह के दोबारा भाजपाई होने से सबसे ज्यादा गड़बड़झाला अमेठी की सियासत में होने वाला है जहां से अभी तक कांग्रेस के प्रथम परिवार का एकाधिकार था और अब केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी उस एकाधिकार को तोड़कर लोकसभा सांसद हैं और खुद संजय सिंह जिस रियासत के राजकुमार और राजा रहे हैं।

विज्ञापन


यह गड़बड़झाला इसलिए भी है कि अमेठी से वर्तमान भाजपा विधायक गरिमा सिंह अमेठी रियासत की पहली बहू यानी संजय सिंह की पहली पत्नी हैं जबकि 2007 में संजय सिंह की मौजूदा पत्नी अमिता सिंह यहां से चुनाव जीत चुकी हैं और 2012 और 2017 में लगातार यहां से हारने के बावजूद इस सीट पर उनका दावा बरकरार है।

कभी पहले संजय गांधी को फिर राजीव गांधी को अमेठी लाकर लोकसभा चुनाव लड़वाने वाले संजय सिंह न सिर्फ 1999 में राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी से और हाल ही में 2019 के लोकसभा चुनाव में सुल्तानपुर से संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी से चुनाव लड़कर हार चुके हैं और 2014 में संजय सिंह की पत्नी अमिता सिंह मेनका के बेटे वरुण गांधी के खिलाफ सुल्तानपुर से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ कर हार चुकी हैं। अब सोनिया गांधी की कांग्रेस को छोड़ चुके संजय सिंह और अमिता सिंह के भाजपा में आने से गरिमा सिंह, मेनका गांधी और वरुण गांधी कितने सहज रह पाएंगे यह भी एक सवाल है।
विज्ञापन


इसके पहले समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सदस्य रहे नीरज शेखर सिंह भी संसद और पार्टी से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। अब जल्दी ही संजय सिंह भी भाजपा में शामिल हो जाएंगे। इसके पहले भी राज्यसभा में तेलुगू देशम के छह में चार सांसदों का विलय भाजपा में कराकर सत्ता पक्ष ने एक नया इतिहास रच दिया। क्योंकि संविधान के अनुसार राज्यसभा सदस्य संसद के उच्च सदन में संबंधित राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं और किसी भी राज्य के विधायक ही राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव मतदान के द्वारा करते हैं, लेकिन आंध्र प्रदेश में एक भी विधायक न होने के बावजूद राज्यसभा में आंध्र प्रदेश से उसके चार सदस्य हो गए। इस नाते यह दलबदल का नया सियासी मॉडल है।

भाजपा का यह रणनीतिक मॉडल सिर्फ राज्यसभा में अपनी ताकत बढ़ाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि विपक्ष का मनोबल गिरान और राज्यों में भी अपनी ताकत बढ़ाने, सरकार बनाने का नया सियासी दांव भी है। गोवा और कर्नाटक में भाजपा यह दांव बखूबी चल चुकी है।

गोवा में कांग्रेस विधायक दल ने दो तिहाई सदस्य यानी कुल बचे 15 विधायकों में से नेता विपक्ष समेत 10 विधायक एक साथ भाजपा में आ गए और नेता विपक्ष को फौरन उप मुख्यमंत्री पद पर सुशोभित कर दिया गया। कांग्रेस की हालत लोकसभा चुनावों के बाद ऐसी हो गई है कि उसकी दिशा और दशा दोनों ही दयनीय है। संसद में प्रतीकात्मक विरोध दर्शाने के सिवा उसके पास अब जमीनी प्रतिरोध की न ताकत है और न ही इच्छाशक्ति। 

सियासत का पूरा मैदान भाजपा के लिए खाली और खुला है। ये तो भाजपा नेतृत्व की कृपा है कि अभी उसने अपना रुख मध्य प्रदेश और राजस्थान की तरफ नहीं किया है जिससे इन दोनों राज्यों की कांग्रेस सरकारें फिलहाल चल रही हैं। वैसे इस्तीफा दिलाकर अपनी संख्या बढ़ाने का यह सियासी मॉडल मध्य प्रदेश में कर्नाटक की तरह कब लागू हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। राजस्थान में अंतर थोड़ा ज्यादा है लेकिन मोदी शाह की जोड़ी वहां भी कोई न कोई रणनीतिक दांव खेल सकने में सक्षम है।

अगर पूरी तरह कांग्रेस मुक्त के अपने नारे को फलीभूत करने का पक्का इरादा इस जोड़ी का है तो अरुणाचल प्रदेश का मॉडल छत्तीसगढ़ में भी लागू हो सकता है जहां मुख्यमंत्री समेत पूरी सरकार ही भाजपा में विलीन हो गई जबकि उस सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बहाल किया गया था।

अब बात डॉ.संजय सिंह की जो अमेठी रियासत के वारिस हैं। उनके पिता अमेठी के पूर्व नरेश राजा रणरंजय सिंह बेहद सम्मानित शख्स थे। हालांकि उनका जुड़ाव हिंदू महासभा से था, लेकिन उन्होंने अपने बेटे और युवराज संजय सिंह को कांग्रेस में जाने की इजाजत दी। संजय सिंह आपातकाल के दौरान संजय गांधी के बेहद नजदीक थे। इंदिरा गांधी अमेठी के बगल की लोकसभा सीट रायबरेली से चुनाव लड़ती थीं।

संजय सिंह के सुझाव पर ही 1977 में संजय गांधी ने अपना पहला चुनाव अमेठी से ही लड़ा और हार गए। लेकिन 1980 में संजय गांधी अमेठी से चुनाव जीते और उनकी जीत में संजय सिंह की मेहनत की भी भूमिका थी। संजय गांधी की असामयिक मौत के बाद जब अमेठी उपचुनाव में संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी ने संजय विचार मंच बनाकर अपने जेठ और कांग्रेस उम्मीदवार राजीव गांधी के खिलाफ मैदान में थी, तब संजय सिंह कांग्रेस और राजीव गांधी के साथ रहे।

वह राजीव के भी उतने ही करीब हो गए जितने कभी वह संजय गांधी के करीब थे। अस्सी के दशक में उत्तर प्रदेश में संजय सिंह कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता थे और वह लगातार कई वर्षों तक राज्य में ताकतवर मंत्री रहे।

लेकिन 1988 में उनका तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह के साथ टकराव हुआ और जिसकी परिणति संजय सिंह के पहले मंत्रिमंडल से इस्तीफे और बाद में कांग्रेस से अलग होने के रूप में हुई। वह विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ जनता दल में गए और जब जनता दल बंटा तो संजय सिंह चंद्रशेखर के साथ चले गए और केंद्र में संचार मंत्री बने। इसी दौर में मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी सैयद मोदी हत्याकांड में उन पर आरोप लगे, लेकिन अदालत से वह बरी हुए।

उनके ऊपर जानलेवा हमला भी हुआ, जिसमें बुरी तरह घायल हुए, लेकिन बाद में स्वस्थ होकर फिर राजनीति में सक्रिय हुए। नब्बे के दशक के अंतिम वर्षों में संजय सिंह भाजपा में शामिल हो गए और 1998 में अमेठी लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार व सतीश शर्मा को हराकर संसद में पहुंचे। लेकिन 1999 में संजय सिंह को उन सोनिया गांधी से मुकाबला करना पड़ा जो कांग्रेस उम्मीदवार के साथ उस नेहरू गांधी परिवार की अगुआ थीं जिसके साथ कभी संजय सिंह परिवार की तरह माने जाते थे। इस चुनाव में संजय सिंह को सोनिया के हाथों तीन लाख से भी ज्यादा मतों से हार का मुंह देखना पड़ा। हार के बाद कुछ समय तक भाजपा में रहने के बाद संजय सिंह फिर कांग्रेस में शामिल हो गए।

कांग्रेस में संजय सिंह फिर ताकतवर नेता बन कर उभरे। अमेठी में वह पहले सोनिया गांधी फिर राहुल गांधी के चुनावी खेवनहार बने। 2009 में संजय सिंह सुल्तानपुर से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा के लिए चुने गए। जबकि उनकी दूसरी पत्नी अमिता सिंह 2007 के विधानसभा चुनाव में अमेठी से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुनी गईं।लेकिन 2014 में कांग्रेस ने संजय सिंह को असम से राज्यसभा में भेजा और सुल्तानपुर से अमिता सिंह को लोकसभा का टिकट दिया गया। लेकिन अमिता सिंह संजय गांधी के बेटे वरुण गांधी के मुकाबले चुनाव हार गईं।

2017 के विधानसभा चुनाव में जब प्रशांत किशोर की रणनीति के तहत शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस ने मैदान में उतारा तब संजय सिंह को उत्तर प्रदेश कांग्रेस के चुनाव प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया। शुरू में संजय सिंह ने बड़े जोश के साथ पूरे प्रदेश का दौरा करना शुरू किया लेकिन बाद में जब कांग्रेस ने शीला को वापस बुलाकर सपा के साथ गठबंधन किया तो संजय अपनी पत्नी अमिता सिंह जो अमेठी से कांग्रेस उम्मीदवार थीं, को चुनाव लड़ाने के लिए अमेठी में ही जम गए।

इस चुनाव में संजय सिंह की पहली पत्नी गरिमा सिंह अमिता के खिलाफ भाजपा उम्मीदवार थीं और 2012 में अमिता को हराने वाले सपा के गायत्री प्रजापति भी गठबंधन के बावजूद मैदान में थे। अमिता न सिर्फ गरिमा के मुकाबले यह चुनाव हारीं बल्कि गायत्री से भी पिछड़ गईं। हाल ही में हुए 2019 के लोकसभा चुनाव में संजय सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर सुल्तानपुर से भाजपा उम्मीदवार मेनका गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन तीसरे नंबर पर रहे। 

कांग्रेस में संजय सिंह को लेकर हमेशा एक दुविधा बनी रही। हालांकि उन्हें एक बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा में भेजा गया। लेकिन केंद्रीय स्तर पर पार्टी सगंठन में कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई और कई बार प्रदेश अध्यक्ष के लिए उनका नाम चला लेकिन उनकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठाने वालों ने उनका रास्ता रोकने में कामयाबी पाई। अमिता सिंह को जरूर प्रियंका गांधी के यहां खासा महत्व मिलता रहा और उन्हें कांग्रेस की प्रोफेशनल शाखा का उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष भी बनाया गया।

लेकिन संजय सिंह को हमेशा यह टीस रही कि पार्टी नेतृत्व ने उन पर कभी पूरा भरोसा नहीं किया और उन्हें केंद्र या राज्य में जो बड़ी जिम्मेदारी दी जानी चाहिए थी वह नहीं दी गई।.लोकसभा सांसद होने के बावजूद यूपीए सरकार में उन्हें मंत्री भी नहीं बनाया गया।

अब संजय सिंह को लेकर भाजपा ने एक तरफ राज्यसभा में अपनी राह आसान की है, साथ ही अमेठी सुल्तानपुर क्षेत्र में एक बड़े नामधारी नेता को अपने साथ जोड़ा है। संजय सिंह का निजी तौर पर भले ही अब वैसा जनाधार न बचा हो जैसा कभी कांग्रेस के जमाने में उनका हुआ करता था, लेकिन भाजपा में जाकर वह अपनी ताकत बढ़ा सकते हैं। उनकी निजी ताकत और भाजपा का जनाधार मिलकर फिर से संजय सिंह और अमिता सिंह को राजनीतिक रूप से एक बड़ी ताकत बना सकता है।

लेकिन भाजपा के भीतर संजय और अमिता के आने से कुछ समीकरण इधर से उधर होंगे। यह संयोग ही है कि संजय सिंह नेहरू गांधी परिवार की दोनों बहुओं सोनिया और मेनका के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़े और हारे। उनकी पत्नी अमिता सिंह वरुण गांधी के खिलाफ लड़ीं और हारीं। जबकि मेनका और वरुण दोनों ही भाजपा सांसद हैं। 

इसी तरह संजय सिंह की पहली पत्नी गरिमा सिंह जिन्होंने संजय सिंह की तमाम ताकत के बावजूद 2017 में अमिता सिंह को हराया था, भाजपा में विधायक हैं। अब वह कब तक भाजपा में रहेंगी। कहा जाता है कि अमेठी से सांसद और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को लोकसभा चुनाव में गरिमा सिंह के समर्थकों ने वह सहयोग नहीं दिया जो पार्टी उम्मीदवार के नाते उन्हें मिलना चाहिए था। इसलिए स्वाभाविक रूप से स्मृति ईरानी संजय सिंह और अमिता सिंह के साथ खड़ी होंगी।

इससे अमेठी में स्मृति की ताकत भी बढे़गी। लेकिन अमेठी की सियासत में अब संजय और अमिता की क्या भूमिका होगी यह भी भाजपा को तय करना होगा। बहुत मुमकिन है कि संजय सिंह को वापस राज्यसभा में भेजा जाए और अगले विधानसभा चुनाव में गरिमा सिंह की जगह भाजपा अमिता सिंह को अपना उम्मीदवार बनाए। तब गरिमा के लिए भाजपा में बना रहना मुश्किल होगा।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें