मंगलवार को बैठक में शामिल हुए गुट-23 के नेता
उधर संसद का मानसून सत्र 14 सितंबर से शुरू हो रहा है और दोनों सदनों में खासकर राज्यसभा में पार्टी का पक्ष रखने वाले ज्यादातर मुखर नेता गुट-23 में शामिल हैं। राज्यसभा में नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद, उपनेता आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, राजबब्बर तो लोकसभा में तेजतर्रार वक्ता मनीष तिवारी और शशि थरूर जैसे सांसद गुट-23 में शामिल हैं। अब अगर पार्टी इनकी उपेक्षा करती है तो संसद में सरकार को घेरना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए मंगलवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ कांग्रेस संसदीय दल के प्रमुख नेताओं की बैठक हुई, जिसमें गुट 23 के ये सारे मुखर नेता भी शामिल हुए। इस बैठक के जरिए भी सोनिया गांधी ने आपसी मनमुटाव को दूर करने की कोशिश की और संसद में सरकार को घेरने की रणनीति पर चर्चा की।
चिट्ठी लिखने वाले नेताओं को नई जिम्मेदारी नहीं
सूत्रों का कहना है कि पार्टी के भीतर जारी इस खींचतान को बड़े घमासान में न बदलने देने के लिए कांग्रेस नेतृत्व के सबसे बड़े रणनीतिकार और संकट मोचक अहमद पटेल सक्रिय हो गए हैं और उन्होंने गुट-23 (कांग्रेस अध्यक्ष को बदलाव के लिए पत्र लिखने वाले 23 कांग्रेसी नेता) के शीर्ष नेताओं से मुलाकातों का सिलसिला शुरू कर दिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस नेतृत्व ने भी तेजी से फैसले लेने शुरू कर दिए हैं और इन फैसलों से एक संकेत साफ है कि गुट 23 के नेताओं को फिलहाल कोई नई जिम्मेदारी नहीं दी जा रही है। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के फौरन बाद गठित राज्यसभा सासंदों की एक समिति में सदन में दल के नेता गुलाम नबी आजाद, उप नेता आनंद शर्मा और वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल के नाम नहीं हैं।
प्रियंका की टीम में इन्हें मिली जगह
इसी तरह उत्तर प्रदेश में प्रदेश संगठन की कई समितियां गठित की गईं, जिनमें किसी में भी पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर,और पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद और आरपीएन सिंह को नहीं रखा गया। इस पर पार्टी के एक प्रवक्ता का कहना है कि अभी और भी कई घोषणाएं होनी हैं, इसलिए इन वरिष्ठ नेताओं को उनमें समाहित किया जा सकता है। इसी तरह उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव प्रियंका गांधी के लिए गठित सलाहकार समिति में पार्टी ने वरिष्ठ नेता बेगम नूर बानो, पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक और राकेश सचान के साथ दो बार कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ चुके आचार्य प्रमोद कृष्णम को भी जगह दी गई है। आचार्य प्रमोद कृष्णम न सिर्फ कल्कि पीठाधीश्वर हैं बल्कि इन दिनों उत्तर प्रदेश में बेहद आक्रामक तेवर से ब्राह्मणों की उपेक्षा और उत्पीड़न का मुद्दा मीडिया और सोशल मीडिया पर उठा रहे हैं। उनको अपनी सलाहकार समिति में शामिल करके प्रियंका गांधी ने साफ संकेत दे दिया है कि एक तरफ वह भाजपा के हिंदुत्व कार्ड और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुकाबले के लिए एक दूसरे साधु आचार्य प्रमोद कृष्णम को आगे कर रही हैं, साथ ही पार्टी उनके ब्राह्रण कार्ड का भी पूरा फायदा लेना चाहती है।
कुछ नेताओं के तेवर अभी भी तीखे
खबर है कि असंतोष को थामने में जुटे अहमद पटेल की मुलाकात गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल से हो चुकी है और मुकुल वासनिक, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, वीरप्पा मोईली आदि से बात हुई है। जबकि जितिन प्रसाद से प्रियंका गांधी ने बात करके उन्हें समझाया है। बताया जाता है कि उधर गुट-23 के नेता अपने कदम ज्यादा पीछे खींचने को तैयार नहीं हैं। क्योंकि जिस तरह कार्यसमिति की बैठक के फौरन बाद गुलाम नबी आजाद ने एक टीवी न्यूज एजेंसी को लंबा इंटरव्यू देकर अपने तेवर दिखाए और उसके बाद आनंद शर्मा ने भी सरकार और भाजपा के करीब माने जाने वाले एक प्रमुख हिंदी दैनिक को इंटरव्यू देकर यहां तक कह दिया कि अगर पार्टी में सुधार की बात करना बगावत है तो ठीक है हमें मंजूर है।
खड़गे-वेणुगोपाल को अध्यक्ष बनाने को तैयार नहीं
सूत्र बताते हैं कि गुट-23 किसी भी सूरत में केसी वेणुगोपाल या मल्लिकार्जुन खड़गे को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने को तैयार नहीं है। गुट का कहना है कि अगर राहुल गांधी दोबारा अध्यक्ष बने, तो भी उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए और जीतकर ज्यादा मजबूती से नेतृत्व करना चाहिए। इस गुट के एक नेता के मुताबिक राहुल या प्रियंका अगर अध्यक्ष पद के चुनाव में उतरेंगे तो शायद ही कोई उनके खिलाफ नामांकन भरे। और अगर किसी ने भरा भी तो उसका नतीजा भी वैसा ही होगा जैसा कि सोनिया गांधी के मुकाबले में जितेंद्र प्रसाद का हुआ था। जिस तरह सोनिया गांधी निर्वाचित अध्यक्ष के रूप में ताकतवर होकर उभरीं और 20 साल से ज्यादा वह अध्यक्ष रही हैं। इसी तरह राहुल या प्रियंका भी नामित होने की बजाय अगर चुनाव के रास्ते से अध्यक्ष बनते हैं तो उनकी पकड़ पार्टी पर ज्यादा मजबूत होगी और भीतर बाहर के विरोधियों के जुबान पर भी लगाम लग जाएगी। लेकिन अगर राहुल-प्रियंका चुनाव नहीं लड़ते हैं और अपने किसी डमी उम्मीदवार को मैदान में उतारते हैं तो उसके खिलाफ गुट-23 कोई मजबूत उम्मीदवार उतारेगा और तब पार्टी में भीषण घमासान हो सकता है।
मामला इतनी जल्दी खत्म होने वाला नहीं
एक अहम सवाल है कि अब गुट-23 के दिग्गज कांग्रेसी नेताओं के साथ पार्टी नेतृत्व क्या सलूक करेगा, जिन्होंने पार्टी में आमूल-चूल बदलाव की मांग करने वाला पत्र लिखा। प्रकट रूप में सोनिया गांधी ने इस पर अपना दुख व्यक्त करते हुए इसे 'बीती ताई बिसार दे' की शैली में भूल जाने को कह दिया है। लेकिन जिस तरह कार्यसमिति की बैठक में वरिष्ठ नेता और महासचिव अंबिका सोनी ने पत्र लिखने और उसे मीडिया में लीक किए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की और हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुमारी शैलजा और पुद्दुचेरी के मुख्यमंत्री वी.नारायण सामी ने पत्र लिखने वालों की आलोचना की, उससे साफ संकेत है कि मामला इतनी जल्दी खत्म होने वाला नहीं है। दिनभर चली कार्यसमिति की बैठक के बाद रात में गुलाम नबी आजाद के यहां पत्र लिखने वाले कुछ नेताओं की बैठक हुई, जिसमें कपिल सिब्बल, शशि थरूर, मुकुल वासनिक, आनंद शर्मा आदि शामिल हुए उसमें भी भविष्य को लेकर गहन चर्चा हुई।
इन नेताओं को किस बड़े नेता का आशीर्वाद?
एक दूसरा बड़ा सवाल है कि इस पूरी कवायद का सूत्रधार कौन है और इसके पीछे क्या किसी बड़े नेता का आशीर्वाद है। आमतौर पर कहा जा रहा है कि इसके सूत्रधार संजय गांधी और इंदिरा गांधी के जमाने से राजनीति और कांग्रेस की सीढियां चढ़कर शीर्ष तक पहुंचने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा का नाम लिया जा रहा है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि गुट-23 के नामों का विश्लेषण करिए पता चल जाएगा कि पीछे कौन है। कुछ नेता एसे हैं जो बिना अपने सियासी आका की मर्जी के दस्तखत करना तो दूर कलम तक नहीं पकड़ सकते। लेकिन दूसरी तरफ कुछ नेता इससे सहमत नहीं हैं। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के मुताबिक पार्टी के इस संकट में किसी एक नेता की कोई भूमिका नहीं है लेकिन जब नेतृत्व को इस तरह की गतिविधि की जानकारी हुई तो एक रणनीति के तहत अपने कुछ खास लोगों को गुट-23 में शामिल करा दिया, ताकि वहां क्या चल रहा है इसकी जानकारी उन्हें मिलती रहे और मौका मिलते ही ये लोग पाला बदल कर गुट समर्थकों की संख्या घटा दें।
सोनिया गांधी जाने वाली हैं तीन हफ्ते के लिए विदेश
कांग्रेस के भीतर एक और थ्यौरी चल रही है। सोनिया-राहुल के वफादार माने जाने वाले और इस पत्र का समर्थन न करने वाले एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि गुट-23 के कुछ अगुआ नेताओं के तार भाजपा और केंद्र सरकार के कुछ राजनीतिक प्रबंधकों से जुड़े हैं। इन नेताओं की पूंछ सरकार ने अलग-अलग मामलों में दबा रखी है और इनसे कहा गया है कि वह भाजपा और सरकार के खिलाफ जो मर्जी हो वो बोलें लेकिन कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को चुनौती देकर ऐसी स्थितियां बनाएं ,जिससे कांग्रेस भीतरी झगड़ों में बुरी तरह उलझ जाए। चर्चा यह भी है कि सोनिया गांधी जल्दी ही अपनी वार्षिक चिकित्सकीय जांच के लिए विदेश जाने वाली हैं और उन्हें वहां कम से कम तीन सप्ताह तक रहना पड़ सकता है। इसलिए वह चाहती हैं कि विदेश जाने से पहले पार्टी के सारे कील-कांटे दुरुस्त कर लिए जाएं। इसलिए भी इन दिनों पार्टी में संगठन से संबंधी तमाम रुके फैसले लिए जाने लगे हैं।