अमेरिका द्वारा एच-1बी वीजा आवेदन शुल्क को एक लाख डॉलर प्रतिवर्ष तक बढ़ाने के फैसले पर भारत में गहरी चिंता जताई जा रही है। पूर्व भारतीय राजनयिक केपी फेबियन ने इसे “काफी नकारात्मक” करार दिया है। उनका कहना है कि फिलहाल यह शर्त सिर्फ नए आवेदनों पर लागू होगी, मौजूदा वीजा धारकों को इससे राहत दी गई है।
फेबियन ने कहा कि नई शर्तों के तहत केवल वे लोग प्रभावित होंगे जो अक्टूबर 2026 से नया एच-1बी वीजा लेंगे। मौजूदा धारकों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने जोड़ा कि अमेरिकी तर्क यह है कि विदेशी कर्मचारियों को रखना, अमेरिकी नागरिकों की तुलना में सस्ता पड़ता है, लेकिन कुल मिलाकर यह दृष्टिकोण गलत है और इससे प्रतिभा प्रवाह बाधित होगा।
मानवीय पहलू पर चिंता
फेबियन ने याद दिलाया कि जब यह प्रस्ताव पहली बार आया था और ट्रंप प्रशासन ने इसे तत्काल लागू करने का संकेत दिया था, तब भारत ने इसे मानवीय मुद्दा बताया था। अगर यह मौजूदा वीजा धारकों पर लागू होता तो परिवारों के बिखरने की नौबत आ सकती थी। उन्होंने कहा कि मौजूदा दायरे में इसे सीमित करना दिखाता है कि अमेरिकी प्रशासन पर दबाव पड़ा है।
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भारत सरकार की प्रतिक्रिया
भारत सरकार ने भी शनिवार को कहा कि इस फैसले के पूरे असर का अध्ययन किया जा रहा है। विदेश मंत्रालय ने बयान में कहा कि यह कदम न केवल भारतीय उद्योग बल्कि अमेरिकी उद्योग को भी प्रभावित करेगा। मंत्रालय ने कहा कि एच-1बी कार्यक्रम से दोनों देशों की कंपनियों को नवाचार और तकनीकी विकास में लाभ मिला है, इसलिए इस पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।
उद्योग जगत की भूमिका
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय और अमेरिकी उद्योग इस मुद्दे पर आपस में चर्चा करेंगे और समाधान का रास्ता निकालेंगे। मंत्रालय ने बताया कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं में प्रतिभा का आदान-प्रदान प्रतिस्पर्धा और विकास को मजबूती देता है। इसलिए नीति निर्माता आपसी लाभ और मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखकर ही आगे की राह तय करेंगे।
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ट्रंप का कार्यकारी आदेश
यह विवाद तब शुरू हुआ जब मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत एच-1बी वीजा आवेदकों को प्रायोजित करने वाली कंपनियों को 1 लाख डॉलर का वार्षिक शुल्क देना होगा। हालांकि कॉर्पोरेट जगत और कई सांसदों के विरोध के बाद इसे सिर्फ नए आवेदनों तक सीमित किया गया है।