भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज के वकील ने पुणे पुलिस द्वारा एलगार परिषद और माओवादियों के संबंधों की जांच के दौरान जब्त पत्रों और अन्य दस्तावेजों की प्रमाणिकता पर सवाल उठाए हैं। मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी।
पिछले साल अगस्त से जेल में बंद भारद्वाज ने बॉम्बे हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की। भारद्वाज के वकील युग चौधरी ने जस्टिस एन डब्ल्यू सांबरे की पीठ को बताया कि यह दस्तावेज कानून वैध सुबूत नहीं हैं। यह हस्तलिखित होने के बजाय टाइप किए गए हैं साथ ही इनमें किसी के हस्ताक्षर नहीं है। ऐसे में इनकी प्रमाणिकता और स्रोत का सत्यापन नहीं हो सकता।
किसी और के कंप्यूटर में मिले यह दस्तावेज साक्ष्य अधिनियम में भी शामिल नहीं किए जा सकते ऐसे में कैसे पुलिस भारद्वाज को जेल में बंद रख सकती है और उन पर माओवादी होने का ठप्पा लगा सकती है। वहीं पुलिस की पक्ष रख रहे अधिवक्ता ने बताया कि भारद्वाज के माओवादियों संग संबंध होने के पुलिस के पास काफी सुबूत हैं।