पंजाब और दिल्ली में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के मोर्चे के खिलाफ कांग्रेस और आम आदमी पार्टी मिलकर लड़ने को तैयार ही नहीं है। ऐसी ही हालत हरियाणा में है जहां अजय चौटाला की जननायक जनता पार्टी, कांग्रेस और ओम प्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल आदि कई पार्टियां अलग अलग लड़ेंगी। सिर्फ इनेलो का समझौता बसपा से है।
तमिलनाडु में डीएमके, अन्नाडीएमके तो बीजेपी के खिलाफ लड़ेंगी ही लेकिन डीके, एमडीएमके, पीएमके जैसी कई छोटी-छोटी पार्टियां भी कई मोर्चे बनाएंगी। कांग्रेस और डीएमके का समझौता तो हो सकता है लेकिन रजनीकांत और कमलहासन की नई पार्टियों के रुख पर भी सभी की नजर रहेगी।
उड़ीसा में भी बीजेपी के खिलाफ बीजू जनता दल और कांग्रेस अलग अलग ही लड़ेंगे और यही हालत जम्मू कश्मीर में होगी जहां पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ फिलहाल अलग-अलग ही लड़ती नजर आ रही हैं। महाराष्ट्र में यदि शिवसेना का भाजपा के साथ समझौता नहीं होता तो वहां वह महानगर नवनिर्माण सेना, भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ चौंकाने वाले संघर्ष में शामिल होगी।
कर्नाटक में मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह में भी ऐसी ही एकता का प्रदर्शन हुआ था जिसमें सोनिया गांधी मायावती का हाथ थामे नजर आई थीं। लेकिन मायावती ने सपा के समझौते में कांग्रेस को शामिल न कर सोनिया के झटका दे दिया। यही नहीं, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ के शपथ ग्रहण समारोहों में भी ऐसी एकता नहीं दिखी।
गैर-भाजपा गैर-कांग्रेसी मोर्चा
टीआरएस, वाईएसआर कांग्रेस, बीजेडी जैसे कई दल कांग्रेस और भाजपा से बराबर की दूरी बनाए रखना चाहते हैं। उनकी कोशिश इसमें तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, सपा-बसपा जैसे कई और दलों के शामिल करने की है।