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लंदन टावर में है भारत की शान रहा कोहेनूर, बड़ी संख्या में देखने आते हैं भारतीय मूल के लोग

Mon, 22 Oct 2018 04:54 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोहिनूर और लंदन टावर
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हीरे की बात हो और कोहेनूर का जिक्र नहीं हो ऐसा नहीं हो सकता। कोहेनूर हीरे के बारे में आज भी अनगिनत कहानियां प्रचलित हैं। कुछ में इसे श्रापित कहा जाता है तो कहीं इसे दुनिया का सबसे नायाब हीरा बताया जाता है। कुछ तो ऐसा है जो लोगों को कोहेनूर यानी रोशनी के पर्वत की तरफ खींचता है। कोहेनूर फारसी भाषा का शब्द है। खासकर भारतीयों के मन में यह जिज्ञासा जरूर रहती है कि एक बार देखें तो यह लगता कैसा है। फिलहाल कोहेनूर लंदन टावर में महारानी के ताज में जड़ा है। इसे देखने के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं।
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आइये जानते हैं आखिर ऐसा क्या खास है कोहेनूर हीरे में। इसका वजन 105.6 कैरेट है। इतिहास बताता है कि इस हीरे को दक्षिण भारत की गोलकुंडा खदानों से निकाला गया और काकतेय शासकों के खजाने में सबसे पहले इसने स्थान पाया। 18वीं सदी में इसे कोहेनूर नाम दिया गया था। इसके बाद यह भारत, अफगानिस्तान और ईरान के कई शासकों के पास से होते हुए आखिर ब्रिटिश खजाने का हिस्सा बना।

1849 में पंजाब जीतने पर अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह से लेकर इसे रानी विक्टोरिया को सौंप दिया। दिलचस्प यह कि 1851 में कोहेनूर की ख्याति देखते हुए लंदन में इसे प्रदर्शन के लिए रखा गया पर दर्शकों को इसमें कुछ खास नजर नहीं आया। कोहेनूर किसी को भी प्रभावित नहीं कर पाया। रानी विक्टोरिया के पति प्रिंस अल्बर्ट के निर्देश पर इसे अच्छी तरह तराशा गया। उसके बाद इसकी शान देखते ही बनती थी। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि कोहिनूर को कभी भी बेचा नहीं गया।
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अभिशाप का बोझ

कोहेनूर के बारे में तरह-तरह की किंवदंतियां हैं। शायद यही वजह है कि इंग्लैंड में इसे केवल राजपरिवार की महिलाओं ने ही पहना है। क्वीन विक्टोरिया इसे अपनी पोशाक पर लगाती थीं। फिलहाल इस पर क्वीन एलिजाबेथ का अधिकार है। उनके मुकुट में इसे जड़ा गया है। यही मुकुट दर्शक लंदन टावर में ट्रैवलेटर से गुजरते हुए अन्य राजसी आभूषणों के साथ देख सकते हैं। दिलचस्प यह कि कोहेनूर पर भारत के अलावा पाकिस्तान और अफगानिस्तान के लोगों ने भी दावा किया हुआ है जबकि ब्रिटिश सरकार कहती है कि यह भारत से भेंट में मिला है। इसके लिए लाहौर संधि का हवाला दिया जाता है।  
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