रमजान के महीने में उपवास करने वाले मुसलमान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक कुछ नहीं खा पी सकते हैं। वो न ही शारीरिक संबंध बना सकते हैं। रोजा रखने से पहले हर दिन रोजे की नीयत करनी होती है। रोजे की नीयत रात को सोने से पहले या सहरी के वक्त की जा सकती है। लेकिन माहवारी से गुजर रही महिलाएं न रोजा रख सकती हैं, न कुरान पढ़ सकती हैं और न ही मस्जिद में जा सकती हैं। गर्भवास्था, बीमारी, शारीरिक या मानसिक कमजोरी, अधिक उम्र होने, यात्रा पर होने, उपवास की वजह से जीवन को किसी तरह का खतरा होने या अधिक प्यास लगने की स्थिति में भी रोजा छोड़ा जा सकता है।
मुस्लिम स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष सबरीन इमताइर ने बीबीसी से कहा कि लोगों को माहवारी और उससे जुड़ी मासिकता के बारे में बात करने में मदद करना चाहती थीं और इस बारे में बात शुरू करने के लिए ही उन्होंने इस बारे में ट्वीट किए। वो कहती हैं, "मेरे परिवार में इस तरह की बातों को लेकर खुलापन है, लेकिन कुछ लड़कियां, खासकर रमजान में, परिवार के पुरुष सदस्यों के सामने कुछ भी नहीं खाती हैं और इस दौरान शर्मिंदा भी महसूस करती हैं।" 18 वर्षीय सबरीन कहती हैं, "इसे कलंक तक मान लिया जाता है। माहवारी को छुपाना और इसे लेकर शर्मिंदा होना पितृसत्ता को बढ़ावा देता है। ये स्त्रीत्व को लेकर राय को भी प्रभावित करता है।"
हालांकि सबरीन का अपना अनुभव अलग है। वो माहवारी के दौरान अपने घर में सबके सामने खुलकर खा पाती हैं। वो कहती हैं, "मैं अपने लिए कुछ खाने के लिए लेने गई। मेरे भाई का रोजा था। उसने पूछा कि मैं क्यों ऑर्डर कर रही हूं तो मैंने बता दिया कि मेरे पीरियड्स हैं और वो इसे लेकर सहज था।" हालांकि सबरीन मानती हैं कि माहवारी पर और खुलकर बात होनी चाहिए। वो कहती हैं, "मेरी मां ने मुझे पैड का इस्तेमाल करना और रक्तस्राव से निबटना तो सिखाया लेकिन ये नहीं बताया कि इस बारे में लोगों से कैसे बात की जाए।" 'मैं हाल के दिनों तक इस बारे में किसी से बात नहीं करती थी। ये एक कलंकित समझी जाने वाली चीज सी है लेकिन हम सबको पीरियड होते हैं। ये सामान्य है और हमें इसे सामान्य ही मानना चाहिए।'