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जानें कब-कब राज्यपालों ने राज्यों में सत्ता बनाई और बिगाड़ी

Wed, 16 May 2018 02:50 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
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कर्नाटक चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। दोनों पार्टियां- भाजपा और कांग्रेस यहां सरकार बनाने का दावा कर रही हैं। सरकार किसकी बनेगी, यह अब राज्यपाल के फैसले पर निर्भर करता है। राज्यपाल जिस पार्टी को पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे, वो अपने हिसाब से विधायकों को 'जोड़-तोड़ कर' संख्याबल जुटाने का प्रयास करेगी। यह बहुत संभव है कि जोड़-तोड़ कर कर्नाटक में सरकार बना ली जाए और इसीलिए सभी की नजरें अब राज्यपाल के फैसले पर टिकी हैं।

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राज्यपालों की राजनीतिक भूमिका को लेकर भारतीय इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। लंबे अरसे तक राजभवन राजनीति के अखाड़े बने रहे हैं। उत्तर प्रदेश में रोमेश भंडारी, झारखंड में सिब्ते रजी, बिहार में बूटा सिंह, कर्नाटक में हंसराज भारद्वाज और कई अन्य राज्यपालों के फैसले राजनीतिक विवाद का कारण बने हैं। संघीय व्यवस्था में राज्यपाल राज्य और कार्यपालिका के औपचारिक प्रमुख के रूप में काम करते हैं, खास तौर पर तब जब राजनीतिक उथल-पुथल होती है। राज्यपाल के पद को लेकर अभी तक तीन बातें मानी जाती रही हैं। 

पहला कि यह कि ये एक सेरेमोनियल यानी शोभा का पद है। दूसरा कि इस पद पर नियुक्ति राजनीतिक आधार पर होती है और तीसरा ये कि संघीय व्यवस्था में राज्यपाल केंद्र के प्रतिनिधि होते हैं। केंद्र सरकार जब चाहे उनका इस्तेमाल करे, जब चाहे हटाए और जब चाहे नियुक्त करे लेकिन यह केवल शोभा का पद नहीं है। अगर होता तो हर नई सरकार के आने के बाद राज्यपालों को बदलने और उनके तबादले इतने महत्वपूर्ण न हो जाते। दशकों से राज्यपाल के पद का इस्तेमाल राज्य की सत्ता बनाने और बिगाड़ने के लिए किया जाता रहा है, ऐसी ही कुछ कहानियां।

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ठाकुर रामलाल

ठाकुर रामलाल साल 1983 से 1984 के बीच आंध्रप्रदेश के राज्यपाल रहे थे। उनके एक फैसले के बाद वहां की राजनीति में तब भूचाल आ गया था, जब उन्होंने बहुमत हासिल कर चुकी एनटी रामराव की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। एनटी रामाराव हार्ट सर्जरी के लिए अमेरिका गए हुए थे। राज्यपाल ने सरकार के वित्त मंत्री एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया। अमेरिका से लौटने के बाद एनटी रामराव ने राज्यपाल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, इसके बाद केंद्र सरकार को शंकर दयाल शर्मा को राज्यपाल बनाना पड़ा। सत्ता संभालने के बाद नए राज्यपाल ने एक बार फिर आंध्रप्रदेश की सत्ता एनटी रामाराव के हाथों में सौंप दी।

पी वेंकटसुबैया

राज्यपाल की राजनीतिक भूमिका की यह कहानी 80 के दशक की है। कर्नाटक में 1983 में पहली बार जनता पार्टी की सरकार बनी थी। उस समय रामकृष्ण हेगड़े राज्य के मुख्यमंत्री बनाए गए थे। पांच साल बाद जनता पार्टी एक बार फिर सत्ता में आई। टेलीफोन टैपिंग मामले में हेगड़े को इस्तीफा देना पड़ा और उनके बाद एसआर बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने। उस समय कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल पी वेंकटसुबैया ने एक विवादित फैसला लेते हुए बोम्मई की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। राज्यपाल ने कहा कि सरकार विधानसभा में बहुमत खो चुकी है। राज्यपाल के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। फैसला बोम्मई के हक में आया और उन्होंने फिर से वहां सरकार बनाई। यह भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि बहुमत होने न होने का फैसला सदन में होना चाहिए, कहीं और नहीं।

गणपतराव देवजी तापसे

राजनीतिक फेदबदल में राज्यपाल की भूमिका की तीसरी कहानी है हरियाणा की। यहां जीडी तापसे 1980 के दशक में हरियाणा के राज्यपाल बनाए गए थे। उस समय राज्य में देवीलाल के नेतृत्व वाली सरकार थी। साल 1982 में भजनलाल ने देवीलाल के कई विधायकों को पटा लिया। राज्यपाल तापसे ने इसके बाद भजनलाल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जिस पर देवीलाल ने कड़ा विरोध जताया। देवीवाल अपने कुछ विधायकों को लेकर दिल्ली के एक होटल में चले गए, पर विधायक वहां से निकलने में कामयाब रहे। अंत में भजनलाल ने विधानसभा में बहुमत साबित कर दिया और सरकार बनाने में कामयाब हुए।
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रोमेश भंडारी

साल 1998 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार थी। इस साल 21 फरवरी को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने सरकार को बर्खास्त कर दिया। नाटकीय घटनाक्रम के बीच जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। कल्याण सिंह ने इस फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को असंवैधानिक करार दिया। जगदंबिका पाल दो दिनों तक ही मुख्यमंत्री रह पाए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद कल्याण सिंह फिर से मुख्यमंत्री बने। 

सैयद सिब्ते रजी

साल 2005 में झारखंड भी राज्यपाल के फैसले के कारण राजनीति उठा-पटक का गवाह बना। इस साल राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में शिबू सोरेन को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई। लेकिन शिबू सोरेन विधानसभा में अपना बहुमत साबित नहीं कर पाए और नौ दिनों के बाद ही उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद 13 मार्च, 2005 को अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी और मुंडा दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। 

बूटा सिंह

बिहार की राजनीति भी राज्यपाल के फैसले से जुड़े विवादों के घेरे में रही है। साल 2005 में बूटा सिंह बिहार के राज्यपाल थे। उन्होंने 22 मई, 2005 की मध्यरात्रि को बिहार विधानसभा भंग कर दी। उस साल फरवरी में हुए चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त हुआ था। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ में थी। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। बूटा सिंह ने तब राज्य में लोकतंत्र की रक्षा करने और विधायकों की खरीद-फरोख्त रोकने की बात कह कर विधानसभा भंग करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने बूटा सिंह के फैसले को असंवैधानिक बताया था।

हंसराज भारद्वाज

कर्नाटक में राज्यपाल के हस्तक्षेप का एक मामला 2009 में देखने को मिला था, जब यूपीए की सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके हंसराज भारद्वाज को वहां का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। हंसराज भारद्वाज ने अपने कार्यकाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। उस समय बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री थे। राज्यपाल ने सरकार पर विधानसभा में गलत तरीके से बहुमत हासिल करने का आरोप लगाया और उसे दोबारा साबित करने को कहा था।
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