कांग्रेस ने जब प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी, उस वक्त कार्यकर्ताओं ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया था। प्रियंका गांधी को पार्टी के भीतर पहली बार इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह था। दरअसल, पार्टी कार्यकर्ता इसी क्षण का इंतजार कर रहे थे। कार्यकर्ताओं को लग रहा था कि प्रियंका गांधी ही वह शख्स हैं जो कांग्रेस को फिर से पुराने चमत्कार की तरफ लौटा सकती हैं। पार्टी की खोई हुई धरोहर वापस दिला सकती हैं।
यही वजह थी कि साल 2019 में कांग्रेस कार्यकर्ता प्रियंका गांधी को गेम चेंजर की तरह देख रहे थे। उनके राजनीति में प्रवेश करते ही कहा गया कि यूपी में कांग्रेस पहले से ज्यादा मजबूत बनकर उभरेगी। यहां तक दावे किए गए कि देशभर में कांग्रेस को प्रियंका गांधी के पार्टी ज्वॉइन करने से मजबूती मिल सकती है। लेकिन, यूपी में उल्टा कांग्रेस, भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हुई। कांग्रेस ने सूबे में गैर-भाजपाई वोटो को काटा जो कि सीधे तौर पर सपा-बसपा गठबंधन में जा रहे थे।
अगर कांग्रेस यूपी में गठबंधन के साथ मिलकर लड़ती को भारतीय जनता पार्टी की सीटें कटती। लेकिन, कांग्रेस के अलग लड़ने की वजह से गठबंधन को नुकसान और भारतीय जनता पार्टी को फायदा हुआ। इस बात को सीधे तौर पर 2019 के चुनाव परिणाम देखा जा सकता है। आठ से भी ज्यादा सीटों पर सीधे तौर पर कांग्रेस ने गठबंधन के वोट काटे और अगर इन सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशी खड़े नहीं होते तो गठबंधन की जीत होती।
प्रियंका और राहुल गांधी यह कहते हुए दिखे कि उनका मकसद 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को सूबे में मजबूत करना है। दरअसल, कांग्रेस पहले से ही यूपी में अपनी जमीन खो चुकी थी ऐसे में उसके लिए फिर से खड़ा हो सकना मुश्किल था। साल 2019 में पार्टी सूबे में एक ही सीट पर सिमट गई। कांग्रेस यूपी में सीट बंटवारे को लेकर भी पूरी तरह से विफल रही। हालांकि, प्रियंका गांधी यूपी में राहुल गांधी से बेहतर वक्ता साबित हुई। इस बात को जनता ने भलीभांति देखा है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि उनकी यही वाकपटुता साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सूबे में कांग्रेस को फायदा पहुंचा सकता है। लेकिन, यह बात भी सही है कि भारतीय राजनीति बदल गई है और अब किसी भी नेता के लिए उसका सरनेम ही काफी नहीं है। मतदाताओं की नई पीढ़ी है। नई पीढ़ी के जेहन में न ही इस तरह से इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की याद समाई हुई है कि वह 'गांधी' लगे होने से ही प्रत्याशी को जीता दें। ऐसे में प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के लिए नई भारतीय मतदाता पीढ़ी को लुभाना आगे भी मुश्किल होगा।