नेता और कारिंदे भावनाओं का दोहन करते आ रहे हैं। हमारी गलती या कमजोरी थी कि एक समाज के रूप में हमने उन्हें चिन्हित नहीं किया और उन्हें निरंकुश होने दिया। तो अब सवाल एक सामूहिक अपराधबोध का भी है लेकिन इसके बारे में सोचने की फिलहाल किसी को फुर्सत नहीं।
इन हालात में मानवाधिकारवादी जस्टिस रजिंदर सच्चर याद आते रहेंगे। उनकी अगुवाई वाली कमिटी ने ही पहली बार इस देश के अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों की आबादी, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थितियों के बारे में बताया था कि वे किस बदहाली में रहे हैं। उनका 'भला करने वाली' सरकारें उन्हें समाज और राजनीति के किन अंधेरों में धकेल कर आप चमक रही हैं। सच्चर साहब की रिपोर्ट आप यहां पढ़ सकते हैं।
'बीच का रास्ता नहीं होता'
लेकिन तमाम किस्म के प्रपंच सोशल मीडिया के हवाले से लोगों के जेहन में चस्पां किए जा रहे हैं। निंदा या विरोध करने वाली आवाजों को कोई सुनता नहीं और जहां से वे आती हैं वे स्रोत सूख रहे हैं। चुनी हुई तरफदारियां हैं और चुने हुए विरोध। मुख्यधारा की हां में हां रखिये तो सुखी रहिए और ना में जाइये तो खुद को तकलीफ में डालिए।
बहुसंख्यकवाद, राजनीतिक दलों का सफलता का अघोषित मंत्र है और हमारे समय के अधिकांश प्रगतिशीलों और बौद्धिकों का भी। वे लिबरल हैं लेकिन न जाने क्यों ठिठके हुए हैं। वे नापतौल के माहिर हैं। खांचों में बांटकर वे अपनी प्रगतिशीलता का हिसाब करते हैं। हिंदूवादी कट्टरता के किसी उत्पात की निंदा करते हुए वे इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि मुस्लिम कट्टरता का भी उदाहरण लेते आएं। यह नव-संतुलनवाद है। बौद्धिक तटस्थता। लेकिन यह एक आपराधिक तटस्थता भी है। कवि पाश ने कहा तो था, 'बीच का रास्ता नहीं होता'।
आप नहीं कह सकते कि मुसलमान अपनी नमाज का इंतजाम खुद करें। यह उन्हें और दूर कर देने की इरादतन कार्रवाई होगी। जैसा कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने न जाने किस इरादे में कह दिया था कि बीजेपी, कांग्रेस पर मुस्लिम पार्टी का ठप्पा लगाने पर आमादा है और सफल है। कांग्रेस अपनी हिंदूवादी चाहत की नुमाइशें राहुल गांधी और अन्य के सौजन्य से कर रही है।
मुसलमानों के पास नमाज पढ़ने के लिए कितनी जगह है। उनके पास कितनी मस्जिदे हैं। मध्यवर्गीय शहरी कॉलोनियों में उनकी मौजूदगी किस तरह की है। ये सारे आंकड़े हमारे पास अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय से, आबादी के अध्ययनों से और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में आ चुके हैं। इसके बावजूद कहा जाता है कि वे अपनी नमाज की व्यवस्था खुद करें और खुली सार्वजनिक जगहों को न घेरें।
नमाज के मुद्दे, दरगाहों और मस्जिदों के मुद्दे, रहन सहन, पोशाक और खानपान के मुद्दे एक के बाद एक सामने आ रहे हैं। मध्यवर्गीय शहरी ढांचे में मुसलमानों को जगह नहीं मिली है और इसका दोष हमारे कई जोशीले प्रगतिशील उन्हें ही देते हैं। वे ऐसा जोश में कर रहे हैं या किसी सुनियोजित 'होश' में ये समझना होगा। राजनीतिक गलियारों में, सरकारी नौकरियों में, निजी कंपनियों में, पद-पैसे और प्रतिष्ठा वाली किसी भी जगह में जिन मुसलमानों की नुमाइंदगी न के बराबर है, आप उनसे उम्मीद कर रहे हैं कि वे अपने लिए नमाज का इंतजाम खुद करें?
ये जरूरी सवाल इसलिए है कि जब तर्क के घोड़े इधर-उधर दौड़ने लगते हैं तो यही कहा जाता है कि मुसलमानों की हालत के लिए वही जिम्मेदार हैं। उनके समाज में मौलवी-मुल्ला हैं, उनमें अशिक्षा, बीमारी, गंदगी, अंधविश्वास और कुप्रथाएं हैं। जबकि ये सब तो कुल समाज की गहरी समस्याएं हैं फिर आखिर मुसलमानों के इर्द गिर्द ही ये जाल क्यों बुना जा रहा है, सामाजिक कुरीतियां और अशिक्षा तो हिंदुओं में भी कम नहीं है। ये मुसलमानों की 'अदरिंग' यानी उन्हें दूसरा या अन्य बनाने की प्रक्रिया है जो तेजी पर है। 'अदरिंग' खुलेआम वार नहीं करती है। वो एक हिडेन प्रोजेक्ट है लेकिन उसके मास्टर माइंड अदृश्य नहीं हैं।
उत्तराखंड जैसे शांत इलाकों में भी 'न घुसने दो' या 'खदेड़ दो' जैसे भयानक स्वर उभर रहे हैं तो उसकी वजह समझनी पड़ेगी। क्या इसका उद्देश्य उस स्थानीय व्यापार पर कब्जा कर लेना है जिसे उन्होंने मेहनत और लगन से सींचा है। वे फल-सब्जी की रेहड़ी लगाते हैं, खेती किसानी करते हैं, गाय-भैंसे पालते हैं, परचून की दुकानें चलाते हैं, कपड़ों के छोटे कारोबारी हैं और कुछ खानाबदोश हैं। दशकों से शॉल, कालीन, दरी, ऊनी कपड़े बेचते आ रहे और वहीं के ही निवासी हो गए हैं। तिरछी नजरें उनका पीछा कर रही हैं। उन्हें कटघरे में रख रही हैं।
प्रताड़ित नागरिक समूह के तौर पर किसी मांग या अधिकार के लिए मुसलमानों को इकट्ठा होने की संभावना तक खत्म कर दी गई है। अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के इर्दगिर्द फैली तबाहियों ने भी उन्हें अपने भीतर सिकोड़ दिया है। कट्टरवादी यही तो चाहते हैं कि देश के मुसलमान एक सामान्य नागरिक के तौर पर मान्यता हासिल करने के लिए अपनी भाषा, परंपरा, खान-पान, रहन-सहन, विरासत सब छोड़ देना होगा। ये दलीलें ही आज सामान्य मानी जाने लगी हैं, बल्कि इन दलीलों में एक फैलती हुई दहाड़ है। ये एक विकराल जबड़ा है।
ये साधारण सी बात हमारे बहुत से विद्वानों और बौद्धिकों को क्यों नहीं दिख रही है कि मुसलमानों से ऐसी 'मांग' तो दरअसल उस अंजाम तक पहुंचाने की खतरनाक मुहिम का अंतिम चरण है जिसके बाद उनके वजूद की परवाह किसी को न होगी। इस दरम्यान इस बात की परवाह कौन करता है कि हम सब लोग अपनी ही तबाही पर आमादा हैं। मनुष्य के रूप में ये सबका मरण होगा, हम सबका। उनका भी जिनकी राजनीति और जिनकी बौद्धिकता पर इस समय घिनौनी इठलाहट का कब्जा है। याद रखिए, बहुसंख्यकवाद उल्टा वार भी करता है।