मैंने कान्वेंट स्कूल से पढ़ाई की और मैं स्कूल में लड़कों की यूनिफॉर्म पहन कर ही जाती थी। मुझे पेंट-शर्ट या जीन्स पहनना काफी असहज लगता था। मैंने 12वीं तक एक कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाई की। वहां भी छेड़छाड़ और मजाक का सामना करना पड़ा इसलिए कॉलेज जाने का मन नहीं किया। इसके बाद मैंने घर पर ही पढ़ाई की।
जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई मैं लड़कों की तरफ आकर्षित होने लगी। लेकिन, मैं अपनी भावनाएं जाहिर नहीं कर सकती थीं क्योंकि मैं लड़की तो सिर्फ घर पर थी लेकिन दुनिया के लिए मैं अब भी 'रूपेश' ही थी। ये बात मुझे हर पल परेशान और बैचेन करती। इसके बाद मैंने सेक्स बदलने की ठानी जो आसान नहीं था। हालांकि, मेरा परिवार मेरे साथ था लेकिन पहले मनोचिकित्सक ने मुझसे लंबी बात की ताकि वो जान सके कि वाकई में मैं एक लड़की बनना चाहती हूं कि नहीं।
डॉक्टर से मिल कर मुझे ये पता चला कि मैं लड़की की तरह दिखने लगूंगी, शरीर भी लड़की की तरह होगा लेकिन कई मायनों में मैं पूरी लड़की अब भी नहीं बन पाऊंगी।
मनोचिकित्सक ने मेरे परिवारवालों को रजामंदी दे दी जिसके बाद मैंने साल 2007 में ट्रांजिशन की प्रकिया शुरू की।
ट्रांजिशन की प्रक्रिया में कई टेस्ट और सर्जरी से गुजरने के बाद भी मेरे जेहन में ये डर समाया रहता कि ये शारीरिक दर्द तो मैं सह लूंगी लेकिन अगर मुझे 'रूद्राणी' के रूप में लोगों ने स्वीकार नहीं किया तो क्या होगा?
लेकिन, जैसे ही मेरा ट्रांजिशन हुआ मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैंने एक संस्था के साथ काम करना शुरु कर दिया। अब मैं अपने परिवार के साथ भी नहीं रहती। मेरी जिंदगी ही बदल गई। दोस्तों ने मेरा साथ दिया लेकिन लोगों ने हमेशा मेरे लुक्स का मजाक बनाया जो कई बार मुझे हीन भावना से भर देता था। लेकिन फिर मैं अपने आपको मनाती। मैंने इसे चुनौती के तौर पर लिया।
मैंने लोगों से मिलना शुरु किया। धीरे-धीरे मेरा दायरा बढ़ने लगा और जैसे ही लोगों ने जाना कि मैं ट्रांसजेंडर हूं तो मॉडलिंग के ऑफर मिलने लगे। मैं एक्टिंग भी करती हूं। मुझे विदेशों से भी मॉडलिंग के ऑफ़र मिलते हैं। छोटा ही सही अब मेरा अपना घर है जिसे मैंने अपने हाथों से संवारा है। आज 'रूद्राणी' अपनी पहचान बना चुकी हैं।
कभी भेदभाव करने वाला समाज भी सम्मान देता है, मेरे व्यवहार को पसंद करता है। मैं अब अपने जैसे लोगों की मदद भी कर रही हूं। एक मॉडलिंग एजेंसी की मालिक हूं। सेक्स ट्रांजिशन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी मेरे जीवन में एक अधूरापन आज भी है। ये कमी हमेशा खलती है। लोग मेरी जिंदगी में आते और चले जाते हैं। कोई मेरा हमसफर बनने को तैयार नहीं क्योंकि मैं 'मां' नहीं बन सकती।