आदमी एक और जिंदगी दोहरी। पहले दोस्त बनकर जानकारियां जुटाते हैं, फिर उसे उसके दुश्मनों तक पहुंचाते हैं। कई लोग तो महज सनसनी या थ्रिल की खातिर मुखबिरी पर उतर आते हैं। ये वे लोग हैं जो दोहरी जिंदगी जीते हैं। एक तरफ तो वे किसी अपराधी गिरोह के लिए काम करते हैं, दूसरी तरफ पुलिस और दूसरी सरकारी एजेंसियों को अपने नियोक्ताओं के बारे में पल-पल की खबर देते रहते हैं। इन्हें मुखबिर के नाम से जाना जाता है। हालांकि बॉलीवुड में उनके लिए खबरी शब्द का इस्तेमाल होता है।
आम जनता की नजरों से पूरी तरह ओझल ये लोग पुलिस और
खुफिया एजेंसियों के आंख और कान हैं। इन्हीं की मदद से ये एजेंसियां सही मायनों में काम कर पाती हैं। कोई भी एजेंसी चाहे जितनी विशाल और कार्य कुशल क्यों न हो, उसकी पहुंच पूरी वांछित जानकारी तक हो ही नहीं सकती। चाहे वो पाकिस्तान, बांग्लादेश या भूटान में आतंकवादियों के अड्डे हों, उच्चस्तरीय राजनीतिक जानकारी का संकलन हो, देश के भीतर जासूसों के कामकाज का अवरोध हो या फिर अपराधों की रोकथाम हो, 'टारगेट' तक सीधी पहुंच रखने वाले लोग ही मुखबिर बनाए जाते हैं।
मुखबिरों की दुनिया में कदम-कदम पर खतरा है। टारगेट से दोस्ती कर उन्हें बेनकाब कर देना एक ऐसा
खतरनाक दोहरा खेल है, जिसे काफी सावधानी से खेला जाना होता है। देश के बाहर की खबर रखने वाली खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के कुछ मुखबिर तो चालीस से पचास हजार रुपये हर महीने कमाते हैं। कुछ के लिए तो यह रोजी रोटी का एकमात्र जरिया है। भारत की आंतरिक खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो (आई. बी.) में भी मुखबिरों को मासिक तौर पर पैसा दिया जाता है। ऐसा कभी-कभी ही होता है कि पैसा रिपोर्ट के आधार पर मिले। आई. बी. और आर्थिक खुफिया एजेंसियों के लिए तो मुखबिर रखने और भुगतान करने के कायदे कानून हैं, पुलिस के लिए ऐसा कोई बंधन नहीं है। न ही पुलिस थाना स्तर पर मुखबिर बनाने और उन्हें पालने के लिए 'सोर्स मनी' के नाम पर कोई राशि अलग रखती है।
ये होते कौन हैं?
शोध छात्र, पत्रकार, बड़े-बड़े व्यापारी, वे बुद्धिमान लोग, जिनके पास एक कुदरती आवरण हो और जो स्थितियों का आकलन कर सकें, आई. बी. द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं। आई. बी. का असली सरोकार जासूसी करना और राजनीतिक खुफियागिरी है।
पत्रकारों या शोध छात्रों की किसी भी स्थिति तक पहुंच ही उनकी ताकत है। वहीं, समाज के उच्च वर्ग में बड़े व्यापारी का उठना बैठना उसे उपयोगी बनाता है। ऐसा नहीं है कि बुद्धिजीवी वर्ग ही आई. बी. का कीमती मुखबिर होता है। किसी दूतावास के महत्वपूर्ण पद पर बैठे राजनयिक का निजी सचिव, दूतावास का कर्मचारी, किसी मंत्री के निवास का टाइपिस्ट या फिर हवाई सफर करने वाला कोई ज्योतिषी भी अच्छी तनख्वाह पा सकते हैं। लेकिन यहां भी कमजोरियों से फायदा उठाया जाता है।
पैसे और शराब का शौक तो आम बात है और कुछ अच्छे-खासे, खाते-कमाते लोग खुद को बहुत सस्ते में बेच देते हैं। राजनेता और राजनीतिक दलों के पदाधिकारी चंद हजार रुपयों की खातिर आई. बी. के लिए काम करते देखे गए हैं। ऐसा इसलिए भी होता है कि कई लोग महज सनसनी या थ्रिल की खातिर मुखबिरी पर उतर आते हैं। उनकी रोजमर्रा की जिंदगी इस कदर उबाऊ और नीरस हो जाती है कि उन्हें कुछ उत्तेजना की जरूरत होती है। लिहाजा वे मुखबिरी शुरू कर देते हैं। इस वर्ग में पेज थ्री क्लास की कई महिलाएं और अन्यथा सफल लोग आते हैं। पैसा उनके लिए कोई मायने नहीं रखता।
आई. बी. के एक पूर्व संयुक्त निदेशक के अनुसार, निम्न वर्ग के 95 प्रतिशत मुखबिर शराब खरीदने के लिए काम करते हैं। क्लर्क और चौकीदार जैसे लोग तो मात्र सफारी सूट के कपड़े जैसी भेंट में ही निपटा दिए जाते हैं, जबकि उन्हें हैंडल करने वाले एजेंट मुखबिरों के मासिक भुगतान के नाम पर नियमित पैसा डकार जाते हैं। मुखबिरों से बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके से काम लेना काफी असाधारण बात है। ऊंची किस्म के जानकार मुखबिर बहुत कम होते हैं। आई. बी. के एजेंटों द्वारा टारगेट ग्रुप के भेदन या फिर किसी मकसद की खातिर मुखबिरों को विशेष कवर मुहैया करवाने के मामले बहुत कम देखने में आए हैं। हालांकि, कुछ दमदार अफसर हैं जरूर। एक मामला काफी दिलचस्प है।