तमाम लोगों के साथ रहना एक अन्य ऐसी परिस्थिति है जिसके मुताबिक इंसान को अपने आपको ढालना होगा। पहले जब हम शिकार पर ही निर्भर थे तो रोजमर्रा के जीवन में आपसी संवाद बहुत कम हुआ करता था। मेयलुंड का मानना है कि हमें अपने आपको इस तरह से ढालना चाहिए था कि हम इस सब से निपट सकते। जैसे लोगों का नाम याद रखने जैसा अहम काम हम कर सकते।
यहां से शुरु होती है तकनीक की भूमिका। थॉमस का मानना है- "दिमाग में एक इंप्लांट फिट करने से हम लोगों के नाम आसानी से याद रख सकते हैं।" वो कहते हैं- "हमें पता है कि कौन से जीन्स दिमाग के इस तरह के विकास में कारगर होंगे जिससे हमें अधिक से अधिक लोगों के नाम याद रहें।"
आगे चल कर हम शायद उन जींसों में बदलाव कर सकें। ये एक विज्ञान कथा जैसा लगता है लेकिन ये मुमकिन है। ऐसे इंप्लांट हम लगा सकते हैं लेकिन ये बात ठीक से नहीं जानते कि उसे किस तरह जोड़ा जाए कि उसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हो सके। हम उसके करीब तो पहुंच रहे हैं लेकिन अभी इस पर प्रयोग चल रहा है। उनका कहना है- "ये अब जैविक से ज्यादा तकनीक का मामला है।"
अबतक हम शरीर के टूटे हुए अंगों को बदल या ठीक कर पा रहे हैं जैसे पेसमेकर लगाना या कूल्हों का बदला जाना। शायद भविष्य में ये सब मनुष्य को बेहतर बनाने में इस्तेमाल हो। इसमें दिमाग का विकास भी शामिल है। हो सकता है हम अपने रंग-रूप या शरीर में तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल करें। जैसे कृत्रिम आंखें जिनमें ऐसा कैमरा फिट हो जो अलग-अलग रंगों और चित्रों की अलग-अलग फ्रीक्वेन्सी पकड़ सके।
हम सबने डिजाइनर बच्चों के बारे में सुना है। वैज्ञानिकों ने पहले ही ऐसी तकनीक ईजाद कर ली है जो भ्रूण के जीन्स को ही बदल दे और किसी को पता भी ना चले कि अब आगे क्या होने वाला है। लेकिन मायलुंड का मानना है कि भविष्य में कुछ जीन्स का ना बदला जाना अनैतिक माना जाएगा। इसके साथ हम चुन पाएंगे कि बच्चा दिखने में कैसा हो, शायद फिर मनुष्य वैसा दिखेगा जैसा उसके माता-पिता उसे देखना चाहते हैं।
मायलुंड का कहना है- "ये अब भी चुनने पर ही निर्भर करेगा लेकिन ये चुनाव अब कृत्रिम होगा। जो हम कुत्तों की प्रजातियों के साथ कर रहे हैं, वही हम इंसानों के साथ करना शुरु कर देंगे।"
ये सब सोचना अभी बहुत काल्पनिक लगता है, लेकिन क्या जनसंख्या के रुझान हमें इस बारे में कुछ संकेत दे सकते हैं कि भविष्य में हम कैसे दिखेंगे? 'ग्रैंड चैलेंजेस इन इको सिस्टम्स एंड दि एनवायरमेंट' के लेक्चरर डॉ जेसन का कहना है- "करोड़ों साल बाद के बारे में भविष्यवाणी करना पूरी तरह काल्पनिक है लेकिन निकट भविष्य के बारे में कहना बायोइन्फोर्मेटिक्स के जरिए संभव है।
हमारे पास अब दुनियाभर से मानव के जैनेटिक सैंपल है। जैनेटिक वेरिएशन और जनसंख्या पर उसके असर को अब आनुवांशिकी वैज्ञानिक बेहतर ढंग से समझ पा रहे हैं। अभी हम साफ तौर पर नहीं कह सकते कि जैनेटिक वेरिएशन कैसा होगा लेकिन बायोइन्फॉर्मैटिक्स के जरिए वैज्ञानिक जनसंख्या के रुझानों को देखकर कुछ अंदाजा तो लगा ही सकते हैं। जेसन की भविष्यवाणी है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों में असमानता बढ़ती जाएगी।
उनका कहना है- "लोग ग्रामीण क्षेत्रों से ही शहरी इलाकों में आते हैं इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरी इलाकों में जैनेटिक विविधता ज्यादा देखने को मिलेगी।" उनका यह भी कहना है- "हो सकता है कि लोगों के रहनसहन में भी ये विविधता दिखने लगे।" ये सब दुनियाभर में एक समान नहीं होगा। उदहारण के तौर पर इंग्लैंड में ग्रामीण इलाकों में शहर के मुकाबले कम विविधता है और शहरों में बाहर से आए लोगों की संख्या ज्यादा।
कुछ समुदायों में प्रजनन दर ज्यादा है तो कुछ में कम। जैसे अफ्रीका की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है तो उनके जीन्स भी विश्व के बाकी समुदायों के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढेंगे। जिन इलाकों में गोरे लोग रहते हैं वहां प्रजनन दर कम है। यही वजह है कि जेसन ने भविष्यवाणी की है कि विश्वस्तर पर सांवले लोगों की संख्या बढ़ती जाएगी। उनका कहना है- "ये तय है कि विश्वस्तर गोरे लोगों के मुकाबले सांवले लोगों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी होगी और इंसान की कई पीढियों के बाद का रंग उसकी आज की पीढ़ी से गहरा ही होगा।"
और अंतरिक्ष का क्या होगा? अगर मनुष्य ने मंगल ग्रह पर बस्तियां बना लीं तो हम कैसे दिखेंगे? कम ग्रुत्वाकर्षण के कारण हमारी मांसपेशियों की बनावट बदल जाएगी। शायद हमारे हाथ-पैर और लंबे हो जाएं। हिम युग जैसे ठंडे वातावरण में क्या हमारे शरीर की चर्बी बढ़ जाएगी और क्या हमारे पूर्वजों की तरह हमारे शरीर के बाल ही हमें ठंड से बचाएंगे? हमें अभी नहीं पता, लेकिन इतना जरूर है कि मनुष्य में आनुवांशिक बदलाव हो रहे हैं।
जेसन के मुताबिक हर साल मानव जीनोम के 3.5 बिलियन बेस पेयर में से लगभग दो में बदलाव हो रहा है। ये सच में शानदार है और इस इस बात का सबूत भी कि लाखों-करोड़ों साल बाद इंसान ऐसा नहीं दिखेगा जैसा आज दिखता है।