पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या मामले में गुरमीत राम रहीम और तीन अन्य दोषियों को सीबीआई की विशेष अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। न्याय पाने का यह सफर इतना आसान नहीं रहा। 5840 दिनों के इस संघर्ष में छत्रपति के परिवार को न जाने क्या-क्या झेलना पड़ा।
लोगों के ये ताने सुन सुन कर उनके कान पक गए थे कि बाबा से समझौता कर लो। शासन-प्रशासन तो बाबा की जेब में है। किस किस से टक्कर लोगे। क्या तुम राम रहीम को जानते नहीं। धमकियों के रुप में इस तरह के सैकड़ों तर्क छत्रपति का परिवार सहता रहा, मगर हिम्मत नहीं हारी।
अपने पिता के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए अंशुल आगे बढ़ता रहा। गुरुवार को नतीजा भी मिल गया। राम रहीम को उम्रक़ैद की सजा सुना दी गई है।
पूर्व सीएम की सलाह थी- पीछे हटने में समझदारी है
नेता, नौकरशाह और पुलिस वाले सहानुभूति जताने आते थे, साथ में चुपके से पीछे हटने की निशुल्क सलाह भी दे जाते। पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल ने हाल ही में 'अमर उजाला.कॉम' के साथ एक खास बातचीत में ऐसे कई खुलासे किए हैं।
उन्होंने बताया कि पिता की मौत के बाद घर में जो भी नेता, प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस वाला आता, वह खूब सांत्वना देता था। मुझे भी लगता कि दुख की घड़ी में सब हमारे साथ हैं। नहीं, ऐसा तो बिल्कुल नहीं था, जाते वक्त मेरे कंधे पर हाथ रख कर वे लोग यह कहना नहीं भूलते कि बात आगे मत बढ़ाओ।
अब क्या फायदा है। बाबा यानी राम रहीम से समझौता करना हर तरीके से मेरे परिवार के हित में रहेगा। हरियाणा के एक पूर्व सीएम जो अब दुनिया में नहीं हैं, ने गजब ही कर दिया। भरोसा था कि वे न्याय की इस लड़ाई में हमारे परिवार का साथ देंगे, मगर नहीं।
पूर्व सीएम ने मेरे पिता के एक मित्र से कहा, इन बच्चों को समझाओ।केस उठा लें, कोई फायदा नहीं होने वाला। ये कानूनी लड़ाई कहां तक लड़ेंगे, थक जाएंगे। इन्हें समझा देना।बतौर अंशुल, खैर हमने उनकी बिन मांगी सलाह का बुरा भी नहीं माना।
हमारा मकसद बड़ा साफ था कि अपने पिता के हत्यारों को सलाखों के पीछे पहुंचाना है।जब हमारे पिता ने राम रहीम के बुरे कामों को दुनिया के सामने उजागर करने में अपनी जान की परवाह नहीं की तो अब हम उनकी औलाद होकर क्या पीछे हटते।सवाल ही नहीं उठता।