फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

स्मृति ईरानी: मोदी विरोधी अनशन से राहुल का किला भेदने तक

Thu, 23 May 2019 11:18 PM IST
अनिल पांडेय न्यूज डेस्क, नई दिल्ली
विज्ञापन
स्मृति ईरानी - फोटो : BBC
विज्ञापन

नरेंद्र मोदी सरकार में निवर्तमान मंत्री स्मृति ईरानी ने अमेठी का अभेद्य समझा जाने वाला किला भेद दिया है। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से 47598 वोटों की बढ़त बना ली है और जीत की ओर बढ़ रही हैं।

विज्ञापन


राहुल गांधी यहां से तीन बार से सांसद थे। उनसे पहले एक बार सोनिया गांधी यहां से चुनी गई थीं। पहले संजय गांधी और फिर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस सीट को गांधी परिवार की सीट के तौर पर स्थापित किया था। राजीव भी यहां से तीन बार चुने गए थे। लेकिन अपने दूसरे प्रयास में पूर्व अभिनेत्री स्मृति ईरानी यह सीट गांधी परिवार से छीनने में कामयाब रहीं।

अमेठी में एक जगह लगी आग बुझाने के लिए कार्यकर्ताओं को निर्देश देते, खुद नल चलाते और अवधीभाषी बुजुर्ग महिलाओं को ढांढ़स बंधाते हुए उन्हें राष्ट्रीय चैनलों पर देखा गया। तब यह तो माना जा रहा था कि स्मृति इस बार 2014 के मुक़ाबले मजबूत नजर आ रही हैं लेकिन वे राहुल गांधी को पटखनी ही दे देंगी, यह आकलन बहुत कम लोगों ने किया था।
विज्ञापन


स्मृति ईरानी 2014 में बनी नरेंद्र मोदी सरकार में पहले मानव संसाधन विकास मंत्री, फिर सूचना-प्रसारण और कपड़ा मंत्री रहीं। इस दौरान उनकी डिग्री से लेकर मानव संसाधन विकास मंत्री के तौर पर उनके बयान खासे विवादों में रहे। खास तौर से रोहित वेमुला प्रकरण को जिस तरह से उन्होंने डील किया, उसे लेकर विपक्ष हमलावर रहा।

इसके बाद भी वह सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारमण के साथ केंद्रीय कैबिनेट की प्रभावशाली महिला चेहरों में बनी रहीं।

जब मोदी के खिलाफ़ अनशन पर बैठी थीं स्मृति

'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' टीवी सीरियल से घर-घर में पहचान बनाने के बाद 2003 में वह भाजपाई पटका पहन सक्रिय राजनीति में उतरीं। लेकिन कम लोग जानते हैं कि एक समय स्मृति ईरानी ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ अनशन पर बैठ गई थीं।

2004 में स्मृति पार्टी में नई नई आई थीं और पार्टी के टिकट पर दिल्ली की चांदनी चौक लोकसभा से चुनाव हार चुकी थीं। तब उन्होंने गुजरात दंगों को लेकर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफ़े की मांग की थी और उनके खिलाफ़ अनशन करने की चेतावनी भी दी थी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का कई बार नाम लेते हुए उन्होंने कहा था कि नरेंद्र मोदी के पद न छोड़ने से वो हैरान हैं। लेकिन पार्टी हाईकमान की ओर से उन्हें तुरंत संदेश दिया गया कि वे अपना बयान वापस लें, वरना कार्रवाई के लिए तैयार रहें।

इसके बाद उन्होंने बिना शर्त अपना बयान वापस ले लिया।

वाक कौशल का इस्तेमाल

भाजपा की राजनीति के पुराने जानकार बताते हैं कि स्मृति ईरानी को राजनीति में लाने के पीछे प्रमोद महाजन थे लेकिन 2006 में उनकी हत्या के बाद स्मृति के राजनीतिक सफ़र की रफ़्तार भी घटी। कुछ समय तक उन्होंने पार्टी के भीतर चुपचाप काम किया, साथ ही अपने वाक कौशल के इस्तेमाल से पहचान भी बनाती रहीं।

इसके बाद ईरानी को महाराष्ट्र भाजपा का महिला मोर्चा अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। 2009 के लोकसभा चुनावों में उन्हें टिकट नहीं मिला लेकिन तीन-चार भाषाओं पर अपनी पकड़ के इस्तेमाल से उन्होंने देश भर में पार्टी का प्रचार किया। 2010 में जब नितिन गडकरी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो स्मृति को पार्टी के राष्ट्रीय महिला मोर्चे की कमान दे दी गई।

अगले ही साल वह गुजरात से राज्यसभा सांसद चुनी गईं और फिर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने लगीं। यही वह दौर था जब वह खुले तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करने लगीं। कई जानकार यह भी मानते हैं कि पार्टी में क़द बढ़ने के साथ उन्हें कुछ स्तरों पर लिंगभेद का सामना भी करना पड़ा।

उन्हें वाक कौशल का फ़ायदा मिला और वह राष्ट्रीय प्रवक्ता बना गईं। टीवी चैनलों पर पक्ष रहते हुए वह भाजपा का एक चर्चित चेहरा बन गईं।

अमेठी की लड़ाई

2014 के आम चुनावों में, जब भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही थी, पार्टी ने उन्हें राहुल गांधी के खिलाफ़ लड़ने अमेठी भेजा। तब तीसरे प्रत्याशी के तौर पर आम आदमी पार्टी से लड़ रहे कवि कुमार विश्वास भी मीडिया की सुर्खियों में थे।

2009 के चुनाव में भाजपा को अमेठी में सिर्फ़ साढ़े 37 हजार वोट मिले थे इसलिए स्मृति ईरानी के पास हासिल करने के लिए बहुत कुछ था। हालांकि यह उनके लिए एक अजनबी क्षेत्र था जहां की भाषा से भी वो अनजान थीं।

उन्होंने इस चुनाव में यह प्रचारित किया कि गांधी परिवार की सीट होने के बावजूद यहां "बीते दस साल में कुछ नहीं हुआ।" वह लोगों के घरों तक गईं, महिलाओं से संवाद बनाया और ग्रामीणों से चर्चा के लिए जमीन पर बैठीं। यहां उन्हें तीन लाख से ज्यादा वोट मिले और राहुल गांधी एक लाख से कुछ अधिक वोटों से ही चुनाव जीत पाए।

डिग्री विवाद

चुनाव हारने के बावजूद राहुल गांधी से लोहा लेने का उन्हें फ़ायदा मिला और वो केंद्र सरकार में मंत्री बना दी गईं। पर उनकी डिग्री को लेकर विवाद शुरू हो गया। स्मृति ईरानी पर चुनाव के समय दाखिल शपथपत्र में अपनी डिग्री की ग़लत जानकारी देने का आरोप लगा।

उन्होंने एक चुनाव शपथपत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय से साल 1996 में कला स्नातक होने की बात कही। वहीं दूसरे शपथ पत्र में उन्होंने 1994 में दिल्ली के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग से बीकॉम पार्ट वन की परीक्षा पास होने जानकारी दी।

फिर 2019 चुनावों के नामांकन के समय भी उन्होंने घोषित किया कि वो ग्रेजुएट नहीं हैं। उन्होंने बीकॉम पार्ट-वन के आगे ब्रैकेट में लिखा "तीन साल का डिग्री कोर्स पूरा नहीं किया गया।"

रोहित वेमुला की आत्महत्या

हैदराबाद यूनिवर्सिटी में दलित शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद स्मृति ईरानी विपक्ष के निशाने पर आ गई थीं। उनके मंत्रालय ने केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय की शिकायत का हवाला देते हुए आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी के एक नेता की पिटाई के आरोप में यूनिवर्सिटी को कार्रवाई करने को कहा था।

इसके बाद यूनिवर्सिटी ने पांच दलित छात्रों को निष्कासित कर दिया था। निष्कासित छात्रों को छात्रावास से भी निकाल दिया गया। बाद में रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी। रोहित की मौत पर ईरानी को संसद में बयान तक देना पड़ा था। उनके बयान पर भी विपक्ष ने उन्हें निशाने पर लिया और संसद को गुमराह करने का आरोप लगाया।

बतौर सूचना-प्रसारण मंत्री

ईरानी को जब सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया तब भी विवादों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनके पद संभालने के बाद ही सूचना-प्रसारण मंत्रालय में तैनात भारतीय सूचना सेवा के तीन दर्जन से ज्यादा अधिकारियों का तबादला कर दिया गया। उनमें ऐसे अधिकारी भी थे जो कुछ महीनों में ही रिटायर होने वाले थे।

इसी विवाद के बीच ईरानी ने ग]लत रिपोर्टिंग (तथ्यात्मक खामी) करने वाले पत्रकारों को दंडित करने का सर्कुलर जारी कर दिया। इसमें पत्रकारों की मान्यता रद्द करने जैसे प्रावधान रखे गए। मीडिया समूहों ने इसका विरोध किया और सर्कुलर जारी होने की रात ही पीएमओ के दखल से यह सर्कुलर वापस ले लिया गया।

विज्ञापन


ऐसे तमाम विवादों के बावजूद स्मृति राजनीति के मैदान में डटी रहीं। वो संभवत: यह समझती थीं कि सियासत में अमेठी उनका ट्रम्प कार्ड साबित हो सकता है।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें