सदस्यों को और किसे मिले हैं विशेषाधिकार
भारत के लोकतंत्र में संसद के सदस्यों को जो विशेषाधिकार प्रदान किए गए हैं उनका मूल उद्देश्य सत्ता को किसी भी रूप या तरीके से बेलगाम होने से रोकने का है। हमने जो संसदीय प्रणाली अपनाई है उसमें बहुमत का शासन होता है मगर अल्पमत में रहने वाले दलों के सदस्यों को भी जनता ही चुनकर भेजती है। उनका मुख्य कार्य संसद के भीतर सरकार को जवाबदेह बनाए रखने का होता है।
सदन की जवाबदेही प्रत्यक्ष रूप से आम जनता के प्रति होती है जिसकी चौकीदारी विरोधी दल के सदस्य करते हैं। यह चौकीदारी इस सीमा तक होती है कि चुने हुए किसी भी सदन के भीतर किसी भी सदस्य को अपनी बात खुलकर कहने का पूरा अधिकार रहता है और इस हद तक रहता है कि उसके किसी भी कथन को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
ये भी पढ़ें: भाजपा सांसदों का राहुल के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस
यह प्रावधान हमारे संविधान निर्माताओं ने इसीलिए किया जिससे संसद के भीतर प्रत्येक चुना हुआ सदस्य बिना सत्ता की धमक और रौब में आए जनता की तकलीफों का बयान बिना किसी खतरे या खौफ के कर सके। यह बेवजह नहीं है कि लोकसभा में इसके अध्यक्ष और राज्यसभा में इसके सभापति की सत्ता सर्वोच्च रखी गई और प्रधानमंत्री तक को उनके प्रति जवाबदेह बनाया गया।
सदन के भीतर सभापति की नजर में प्रधानमंत्री और संसद सदस्य के बीच अधिकारों का कोई भेद नहीं रहता है। इनमें कुछ विशेष नियम हैं जिन्हें शामिल नहीं किया गया है।