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क्या होता है विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव, कौन ला सकता है जानिए सबकुछ

Mon, 23 Jul 2018 04:46 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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parliament in modi
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राफेल डील मामले में कांग्रेस और भाजपा ने एक दूसरे के खिलाफ तलवारें खींच ली हैं। पिछले दिनों भाजपा के चार सांसदों ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाप विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है। उसके बाद सोमवार को कांग्रेस के सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण  पर राफेल डील मामले में लोकसभा में विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश किए जाने की बात कही है।
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इससे पहले भाजपा सांसदों ने राहुल पर विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पर ‘झूठे’ आरोप लगाकर संसद को गुमराह करने का आरोप लगाया है। सदन के नियमों के अनुसार किसी भी सदस्य के खिलाफ आरोप लगाने से पहले गांधी को पहले से नोटिस देना चाहिए था। संसदीय मामलों के मंत्री अनंत कुमार ने कहा कि उन्हें स्पीकर को ठोस सबूत देने चाहिए थे। 

विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव कैसे पेश करते हैं

विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव संसद के किसी सदस्य द्वारा पेश किया जाता है, जब उसे लगता है कि सदन में झूठे तथ्य पेश करके सदन के विशेषाधिकार का उल्लंघन किया गया है या जा रहा है तो वह सदस्य सदन में विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश करता है। 
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Narendra Modi
सदस्यों को और किसे मिले हैं विशेषाधिकार

भारत के लोकतंत्र में संसद के सदस्यों को जो विशेषाधिकार प्रदान किए गए हैं उनका मूल उद्देश्य सत्ता को किसी भी रूप या तरीके से बेलगाम होने से रोकने का है। हमने जो संसदीय प्रणाली अपनाई है उसमें बहुमत का शासन होता है मगर अल्पमत में रहने वाले दलों के सदस्यों को भी जनता ही चुनकर भेजती है। उनका मुख्य कार्य संसद के भीतर सरकार को जवाबदेह बनाए रखने का होता है।

सदन की जवाबदेही प्रत्यक्ष रूप से आम जनता के प्रति होती है जिसकी चौकीदारी विरोधी दल के सदस्य करते हैं। यह चौकीदारी इस सीमा तक होती है कि चुने हुए किसी भी सदन के भीतर किसी भी सदस्य को अपनी बात खुलकर कहने का पूरा अधिकार रहता है और इस हद तक रहता है कि उसके किसी भी कथन को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। 

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यह प्रावधान हमारे संविधान निर्माताओं ने इसीलिए किया जिससे संसद के भीतर प्रत्येक चुना हुआ सदस्य बिना सत्ता की धमक और रौब में आए जनता की तकलीफों का बयान बिना किसी खतरे या खौफ के कर सके। यह बेवजह नहीं है कि लोकसभा में इसके अध्यक्ष और राज्यसभा में इसके सभापति की सत्ता सर्वोच्च रखी गई और प्रधानमंत्री तक को उनके प्रति जवाबदेह बनाया गया।

सदन के भीतर सभापति की नजर में प्रधानमंत्री और संसद सदस्य के बीच अधिकारों का कोई भेद नहीं रहता है। इनमें कुछ विशेष नियम हैं जिन्हें शामिल नहीं  किया गया है।
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RAHUL GANDHI - फोटो : self
प्रेस को भी महत्वपूर्ण अधिकार

 मगर लोकतंत्र में प्रेस की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं।  संसद की कार्यवाही प्रकाशित करने के नियम बनाए गए। संसद की कार्यवाही से यदि कोई शब्द सभापति निकाल देते हैं तो उसे प्रकाशित करने का अधिकार प्रेस को नहीं दिया गया। 

इतना ही नहीं यदि कोई दस्तावेज संसद में रखे जाने से पहले ही प्रेस में प्रकाशित हो जाता है तो उसे भी अवैध स्वरूप में संसद के विशेषाधिकारों का हनन माना गया और दूसरी तरफ संसद के सत्र के चलते यदि सरकार का कोई मंत्री संसद से बाहर नीतिगत या निर्णयात्मक घोषणा करता है तो उसे भी विशेषाधिकार हनन की श्रेणी में रखा गया। 
विशेषाधिकार हनन का यह मामला दोतरफा इसलिए है जिससे सरकार की पहली जवाबदेही संसद के प्रति बनी रहे और उसके हर फैसले की तस्दीक जनता के चुने हुए प्रतिनिधि कर सकें। 
 
बता दें कि सदन में जो भी बोला जाता है वह सीधे आम जनता के पास पहुंचता है और लोग उनके शब्दों को सुन रहे हैं अत: कोई भी अतिरंजित या भारतीयों को भड़काने वाली टिप्पणी करने से पहले उन्हें स्वयं भी सौ बार सोचना चाहिए। 

हमारे संविधान निर्माताओं ने उन्हें विशेषाधिकार इस देश की आम जनता के हितों का संरक्षण करने के लिए दिए हैं, उन्हें आपस में लड़ाने के लिए नहीं। चाहे सत्तापक्ष के लोग हों या विपक्ष के, सभी की यह पहली जिम्मेदारी बनती है कि संसद से जो आवाज जाए वह आम जनता को सशक्त को बनाने और भारत की एकजुटता के लिए जाए, उन्हें धर्म या जाति के नाम पर तोड़ने के लिए नहीं।
 
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