आखिर 25 साल बाद भी बाबरी मस्जिद ढांचे के गिराने और राम मंदिर को लेकर होने वाली सियासत का गुजरात के सोमनाथ से क्या रिश्ता है? आखिर क्यों गुजरात के चुनावी माहौल में अयोध्या की गूंज सुनाई देती है और क्यों सोमनाथ गुजरात की सियासत का मुख्य केन्द्र बन गया है? इन सवालों के जवाब आपको सोमनाथ जाने पर मिल जाते हैं।
दरअसल 25 सितंबर 1990 को जब लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा की शुरूआत की और उसके बाद से देश की राजनीति ने जो उतार चढ़ाव देखे, उसका हश्र 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचे के विध्वंस और उसके बाद राम मंदिर को लेकर होने वाली सियासत के तौर पर नजर आया।
आडवाणी आज भी इसे सोमनाथ मंदिर का आशीर्वाद मानते हैं जिसकी बदौलत भाजपा आज इतनी मज़बूत ताकत बनकर खड़ी है। इसीलिए आडवाणी जी करीब 20 सालों तक हर 25 सितंबर को सोमनाथ जरूर जाते थे। इस मंदिर का एक ट्रस्टी होने के नाते भी आडवाणी का सोमनाथ से खास लगाव है।
गुजरात में जब से भाजपा सत्ता में आई तब से सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट पर इसके नेताओं का वर्चस्व है। केशूभाई पटेल इसके अध्यक्ष हैं। आठ ट्रस्टियों में फिलहाल एक जगह खाली है और बाकी ट्रस्टियों में केशुभाई और आडवाणी के अलावा नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, पी के लाहिरी, हर्षवर्धन लखोटिया और जे डी परमार हैं।