सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) की स्थापना 21 जून, 2009 को नई दिल्ली में की गई। एसडीपीआई पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा है। इसकी स्थापना के एक साल बाद 13 अप्रैल, 2010 को चुनाव आयोग में इसे पंजीकृत कराया गया। एमके फैजी एसडीपीआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
एसडीपीआई की वेबसाइट के अनुसार, जिसमें वो खुद को पूरे देश में फैला हुआ राजनीतिक संगठन बताती है। पार्टी का उद्देश्य मुस्लिम, दलित, पिछड़ा वर्ग और आदिवासी समुदाय के हितों का ध्यान रखना और उनकी भलाई करना है।
एसडीपीआई की वेबसाइट पर आमतौर पर फैजी का चेहरा ही नजर आता है। वेबसाइट पर उन्होंने अपने और पार्टी के बारे में जानकारी दी हुई है। पार्टी का कहना है कि वह देश के नागरिकों की नुमाइंदगी करती है। वेबसाइट के अनुसार, पार्टी का कहना है कि उसका उद्देश्य देश में नव-औपनिवेशिक और नव-उदारवादी संघर्षों से लड़ना है।
वेबसाइट पर कहा गया है कि इसकी स्थापना के बाद देश के विभिन्न राज्यों से लोग पार्टी के सदस्य बने हैं। बताया गया है कि पार्टी धीरे-धीरे देश के विभिन्न भागों में फैल रही है।
दिल्ली में स्थित है पार्टी का मुख्यालय
एसडीपीआई की वेबसाइट में बताया गया है कि इसका मुख्यालय दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित है। हालांकि, पार्टी के अधिकतर पदाधिकारी अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और दक्षिण भारतीय राज्यों से आते हैं। पिछले 10 सालों में इस पार्टी ने दक्षिण भारत के कई शहरों में कार्यक्रमों का आयोजन किया है।
2013 के विधानसभा चुनावों में एसडीपीआई ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे बुरी तरह पराजय हासिल हुई। इस चुनाव में उसे 23 में से 22 सीटों पर करारी हार मिली। पार्टी को इस चुनाव में 3.2 फीसदी वोट हासिल हुए।
एसडीपीआई ने जिन 23 सीटों पर चुनाव लड़ा, वो अधिकतर मुस्लिम बहुल इलाके थे। 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में एसडीपीआई ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की, लेकिन उसने केवल तीन सीटों पर ही उम्मीदवार उतारे। इसमें, मैसूरु में नरसिंहराजा सीट, बंगलूरू में चिकपेट सीट और कलबुर्गी नॉर्थ शामिल रहीं।
पिछले दो सालों में एसडीपीआई ने नगर निकायों चुनावों और ग्राम पंचायत चुनावों में खासा समर्थन हासिल किया है। वहीं, कांग्रेस इस बात को नकारती रही है कि एसडीपीआई के वर्चस्व से पार्टी को खतरा है। लेकिन कुछ नेताओं का मानना है कि एसडीपीआई की लोकप्रियता से अल्पसंख्यक वोट बंट जाएंगे, जिसका फायदा भाजपा को मिलेगा।