हाई स्कूल शिक्षा बोर्ड की दो जुलाई 1946 को जारी अंकसूची बताती है कि किशोर कुमार को अंग्रेजी और इसके साथ पढ़ाये जाने वाले एक अन्य विषय में 175 में से 69 अंक, सामान्य ज्ञान में 25 में से नौ अंक, रसायन शास्त्र एवं भौतिकी (सैद्धांतिक) में 150 में से 64 अंक, भूगोल एवं प्रारंभिक इतिहास में 150 में से 64 अंक, हिन्दी में 150 में से 67 अंक और ड्राइंग में 150 में से 53 अंक प्राप्त मिले थे। क्रिश्चियन कॉलेज में बरसों से इतिहास पढ़ा रहे बाजपेई के पास अपने संस्थान के इस पूर्व छात्र के दिलचस्प किस्सों की लम्बी फेहरिस्त है, जो बाद में भारतीय फिल्म जगत का बड़ा सितारा बना।
वह बताते हैं कि कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही किशोर ने तय कर लिया था कि उन्हें जीवन में क्या करना है। साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी महाविद्यालयीन संस्था "बज्म-ए-अदब" की कार्यकारिणी में भी किशोर शामिल थे।
उन्होंने बताया, "एक बार नागरिक शास्त्र के पीरियड में किशोर अपनी कक्षा में टेबल को तबले की तरह बजा रहे थे। प्रोफेसर ने उन्हें फटकार लगाते हुए हिदायत दी कि वह पढ़ाई पर ध्यान दें, क्योंकि गाना-बजाना उन्हें जिंदगी में बिल्कुल काम नहीं आयेगा। इस पर किशोर ने अपने अध्यापक को मुस्कुराते हुए जवाब दिया था कि इसी गाने-बजाने से उनके जीवन का गुजारा होगा।"
क्रिश्चियन कॉलेज परिसर के खेल के मैदान में आज भी मौजूद इमली का पेड़ नौजवान किशोर की अल्हड़ सुर लहरियों का गवाह है। किशोर लेक्चर से भाग कर इस पेड़ के नीचे यार-दोस्तों की मंडली जमाने के लिए प्रोफेसरों के बीच "कुख्यात" थे।
बाजपेई ने बताया कि किशोर कुमार इमली के पेड़ के नीचे 'यॉडलिंग' (गायन की एक विदेशी शैली) का अभ्यास भी करते थे। उन्होंने खासकर पुरानी हिंदी फिल्मों के गीतों में इस शैली का कई बार खूबसूरती से इस्तेमाल किया और श्रोताओं को गायकी की अपनी इस खास अदा का दीवाना बनाया।
किशोर कुमार अपने छोटे भाई अनूप कुमार के साथ क्रिश्चियन कॉलेज के पुराने हॉस्टल की पहली मंजिल के एक कमरे में रहते थे। मौसम की मार सहने और संरक्षण के अभाव में करीब 100 साल पुराना होस्टल अब खण्डहर में बदल गया है। ऐसा कहा जाता है कि हॉस्टल के उनके कमरे में किताबें कम और तबला, हारमोनियम तथा ढोलक जैसे वाद्य यंत्र ज्यादा रहते थे।
बाजपेई ने बताया कि किशोर कुमार वर्ष 1948 में पढ़ाई अधूरी छोड़कर इंदौर से मुंबई चले गये थे। लेकिन क्रिश्चियन कॉलेज के कैंटीन वाले के उन पर पांच रुपये और 12 आने (उस समय प्रचलित मुद्रा) उधार रह गए थे।
माना जाता है कि यह बात किशोर कुमार को याद रह गयी थी और उधारी की इसी रकम से 'प्रेरित' होकर फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' (1958) के मशहूर गीत "पांच रुपैया बारह आना..." का मुखड़ा लिखा गया था। इस गीत को खुद किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने आवाज दी थी।
चार अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश (तब मध्य प्रांत एवं बरार) के खंडवा में पैदा हुए किशोर का वास्तविक नाम आभास कुमार गांगुली था। उनका निधन 13 अक्तूबर 1987 को मुंबई में हुआ था।