केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की उपस्थिति में मंगलवार को छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने किशाऊ परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, राजस्थान के सीएम भजन लाल शर्मा, दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी शामिल हैं। किशाऊ परियोजना समझौते के तहत उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनेगा, जहां 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल संग्रहण होगा। परियोजना के तहत 97 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। इसके अलावा 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत भी प्राप्त होगी। किशाऊ परियोजना समझौते से सबसे बड़ा लाभ दिल्ली को होगा।
छह राज्यों ने किए हस्ताक्षर
गृह मंत्री शाह ने कहा कि इस परियोजना के पूरा होने के बाद यह घटना इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन जाएगी। समझौते से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली किसी-न-किसी रूप में लाभान्वित होंगे। जब से नरेन्द्र मोदी पीएम बने हैं, यह दसवां जल विवाद समाप्त होने जा रहा है। उन्होंने कहा कि मोदी के नेतृत्व में बीते पचास वर्षों से चले आ रहे गंभीर विवादों को समाप्त करने का अभियान चला है। सबसे पहले अगस्त 2018 में लखवार बहुउद्देशीय परियोजना का विवाद समाप्त हुआ। उसी महीने शाहपुर कंडी बांध परियोजना का विवाद सुलझा। वर्ष 2019 में ऊपरी यमुना बेसिन की रेणुकाजी बहुउद्देशीय बांध परियोजना का विवाद समाप्त हुआ। वर्ष 2021 में केन-बेतवा लिंक परियोजना पर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच समझौता हुआ, जिससे बुंदेलखंड जैसे जल-संकटग्रस्त क्षेत्र को लाभ मिला।
क्या है इस परियोजना में खास
संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल रिवर लिंक योजना वर्ष 2024 में आगे बढ़ी। हथिनीकुंड से भूमिगत पाइपलाइन के माध्यम से यमुना तक जल अंतरण की योजना फरवरी 2024 में स्वीकृत हुई। नर्मदा परियोजना से विस्थापित परिवारों के पुनर्वास का विवाद जुलाई 2026 में पूर्ण हुआ। सोन बेसिन में बिहार और झारखंड के बीच जल बंटवारे का विवाद अगस्त 2026 में सुलझा और अब किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना पर सहमति बनी है। अमित शाह ने कहा कि किशाऊ परियोजना की बात करें तो 12 मई 1994 को एक समझौता हुआ था कि बेसिन में आने वाली प्रत्येक भंडारण परियोजना के लिए अलग-अलग समझौते किए जाएँगे। यदि वह व्यवस्था न होती, तो यह संभव नहीं होता। फिर 2019 में लखवार और रेणुकाजी परियोजनाओं के विवाद समाप्त होने के बाद किशाऊ का कार्य आगे बढ़ा।
शाह ने कहा, बीते 16 जून को इस पर औपचारिक सहमति बनी। जल शक्ति मंत्रालय ने इसे आगे बढ़ाया और सभी राज्यों की सहमति के बाद, तकनीकी एवं आर्थिक पक्षों पर विचार करते हुए तथा सभी राज्यों के हितों की चिंता करते हुए, इसे समाधान तक पहुंचाया गया। केंद्र सरकार ने किशाऊ परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया है। इसका लगभग 90 प्रतिशत वित्तीय भार भारत सरकार वहन करेगी और शेष 10 प्रतिशत राशि 1994 के समझौते के अनुसार भागीदार राज्यों द्वारा वहन की जाएगी। उत्तराखंड सरकार की कुछ कठिनाइयां थीं, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से उन्हें आश्वस्त किया है कि उनकी मांगों को भारत सरकार की योजनाओं के अंतर्गत समाहित करने का प्रयास किया जाएगा। आगे उत्तराखंड पर आने वाले वित्तीय भार के वहन में भी हम उनकी मदद करेंगे।
97 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊँचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनेगा, जहाँ 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल संग्रहण होगा। इससे 97 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत भी प्राप्त होगी। उन्होंने कहा कि इसमें सबसे बड़ा लाभ दिल्ली को होगा। गृह मंत्री ने कहा कि जब यमुना के जल का बंटवारा हुआ, तब नीति-निर्धारकों की ओर से एक गंभीर चूक हुई। यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह की गणना ही नहीं की गई और जितना जल उपलब्ध था, वह सब राज्यों के बीच बाँट दिया गया। नदी के लिए जल छोड़ा ही नहीं गया। उन्होंने कहा कि किशाऊ परियोजना समझौते से 25 प्रतिशत जल आएगा, वह दिल्ली और यमुना दोनों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा। इससे पर्यावरण संरक्षण भी होगा।