आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ऑफलाइन इस्तेमाल में भी डेटा लीक होने का जोखिम होता है। ऐसे में किसी भी गोपनीय केस के मटीरियल को बहुत सावधानी से संभालना चाहिए। लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियों के बीच इंटेलिजेंस कल्चर में 'जरूरत होने पर सूचना देने' से 'जानकारी साझा करने की जिम्मेदारी' की ओर हो रहे बदलाव पर ध्यान देने की आवश्यकता है। ईडी का नजरिया पीड़ितों पर केंद्रित है। ईडी ने 76 केसों में 73800 करोड़ रुपये से ज्यादा की भरपाई की है। जांच एजेंसी का मकसद धोखाधड़ी का शिकार हुए लोगों को उनकी गैर-कानूनी तरीके से छीनी गई संपत्ति वापस दिलाकर न्याय की प्रक्रिया को पूरा करना है।
39 शहरों में ऑफिस बनाने का लक्ष्य
पहले वर्किंग सेशन में मंज़ूर किए गए कैडर रीस्ट्रक्चरिंग (ढांचे में बदलाव) और उससे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर रोडमैप को लागू करने पर चर्चा हुई। इस रीस्ट्रक्चरिंग से डायरेक्टरेट में मंज़ूर पदों की संख्या 2,029 से बढ़कर 3,256 हो जाएगी, फील्ड स्ट्रक्चर का विस्तार होगा। इनमें 50 पीएमएलए और दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में पांच समर्पित फेमा जोन शामिल होंगे)। फंक्शनल यूनिट्स की संख्या 131 से बढ़कर 241 हो जाएगी। इसे 1 जनवरी, 2027 से लागू करने का लक्ष्य है। इसका मकसद जांच की प्रक्रिया के समय को मौजूदा चार-पांच साल से घटाकर लगभग डेढ़ साल करना है। इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में, सेशन में 'प्रोजेक्ट परिवर्तन भवन' के तहत 31 मार्च, 2029 तक डायरेक्टरेट के दायरे में आने वाले सभी 39 शहरों में अपने ऑफिस बनाने का लक्ष्य तय किया गया। साथ ही, कई जगहों पर ज़मीन अधिग्रहण और निर्माण की स्थिति की समीक्षा की गई और बाकी ऑफिसों में सुरक्षा व्यवस्था तैनात करने पर भी चर्चा हुई।
जांच और इंटेलिजेंस के लिए उपलब्ध टूल्स
सम्मेलन में जांच और इंटेलिजेंस के लिए उपलब्ध टूल्स एवं तकनीकों की समीक्षा की गई। नेटग्रिड प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल के ट्रेंड्स की जांच की गई। जोन को सरकारी इस्तेमाल पर कड़ा कंट्रोल रखने का निर्देश दिया गया। इस सेशन में इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम, कॉर्पोरेट फाइलिंग और इमिग्रेशन डेटाबेस तक पहुंच, और वर्चुअल डिजिटल एसेट ट्रांज़ैक्शन रिकॉर्ड हासिल करने के प्लेटफॉर्म के साथ-साथ एफआईयू-आईएनडी के एनालिटिकल प्रोडक्ट्स (जैसे संदिग्ध ट्रांज़ैक्शन रिपोर्ट, कैश ट्रांज़ैक्शन रिपोर्ट, क्रॉस-बॉर्डर वायर ट्रांसफर रिपोर्ट और ऑपरेशनल व टैक्टिकल एनालिसिस) पर भी चर्चा हुई। एफआईयू-आईएनडी के साथ रियल-टाइम कोऑर्डिनेशन प्रोटोकॉल का प्रस्ताव भी रखा गया। एडवांस्ड फोरेंसिक टूल्स और फील्ड एक्विजिशन किट खरीदकर साइबर फोरेंसिक क्षमता बढ़ाने और रीजनल लैबोरेटरी में एक्सपर्ट्स की तैनाती के लिए नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी के साथ डायरेक्टरेट की व्यवस्था का विस्तार करने की भी समीक्षा की गई।
इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड
तीसरे सेशन में इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड और पीएमएलए के बीच आपसी संबंध की जांच की गई। इस सेशन में एक तरफ कोड की धारा 14 के तहत मोरेटोरियम और धारा 32A के तहत मिली छूट, और दूसरी तरफ पीएमएलए के तहत अटैचमेंट की शक्तियों के बीच कानूनी टकराव का विश्लेषण किया गया। साथ ही, बार-बार होने वाली गड़बड़ियों की पहचान की गई, जैसे धारा 29A से बचना, संबंधित पार्टी के दावों को बढ़ा-चढ़ाकर बताना, क्रेडिटर्स की कमेटी में हेरफेर, एसेट स्ट्रिपिंग और आर्टिफिशियली बड़े हेयरकट, जिनके ज़रिए प्रमोटर एसेट्स पर दोबारा कंट्रोल हासिल कर लेते हैं। राज्य पुलिस, सीबीआई, कस्टम्स, डीआरआई, एनसीबी और सेबी से जानकारी के आसान आदान-प्रदान पर ज़ोर दिया गया। साथ ही, एमएल-I और एमएल-II रिपोर्टिंग को मैनुअल रिटर्न से हटाकर सीसीटीएनएस और नेटग्रिड से जुड़े ऑटोमेटेड ऑनलाइन पोर्टल पर लाने का प्रस्ताव रखा गया, जिसमें थ्रेशोल्ड-बेस्ड अलर्ट की सुविधा हो।
प्रत्यर्पण और भगोड़ों के प्रबंधन की समीक्षा
पांचवें सेशन में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, प्रत्यर्पण और भगोड़ों के प्रबंधन की समीक्षा की गई। 'लेटर्स रोगेटरी' (न्यायिक अनुरोध पत्र) और आपसी कानूनी सहायता के अनुरोधों को तैयार करने की गुणवत्ता और संधि के नियमों के पालन पर ज़ोर दिया गया। साथ ही, पांच साल से ज़्यादा समय से लंबित पुराने या गैर-ज़रूरी अनुरोधों की समीक्षा करने और उन्हें वापस लेने के लिए एक अभियान की घोषणा की गई। भगोड़ों के प्रबंधन के लिए चरण-दर-चरण प्रक्रिया को फिर से दोहराया गया। इसमें ब्यूरो ऑफ़ इमिग्रेशन और इंटरपोल नोटिस के ज़रिए यात्रा की जांच से लेकर पासपोर्ट रद्द करना, अदालत की घोषणाएं, 'भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम' के तहत कार्रवाई आदि शामिल हैं। पीएमएलए के तहत बिना सज़ा के संपत्ति ज़ब्त करना और अंत में अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत 'विशेषता के नियम' का ध्यान रखते हुए औपचारिक प्रत्यर्पण या स्थानीय स्तर पर मुकदमा चलाना, यह भी प्रक्रिया का हिस्सा है।
प्री-ट्रायल अनुशासन को मजबूत करें
सभी जोन को निर्देश दिया गया है कि वे प्री-ट्रायल अनुशासन को मज़बूत करें। इसके लिए ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स और गवाहों की लिस्ट तैयार करना, हर प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट के साथ सबूतों का कैलेंडर लगाना, इलेक्ट्रॉनिक और सब्स्टिट्यूटेड सर्विस (नोटिस तामील) को तेज़ी से पूरा करना और छह महीने से ज़्यादा समय से संज्ञान (कॉग्निज़ेंस) का इंतज़ार कर रहे मामलों की हर महीने समीक्षा करना शामिल था। बचाव पक्ष की देरी कराने वाली चालों का मुकाबला करने के उपाय और भाग रहे या छिपे हुए आरोपियों के खिलाफ सख़्त कदम उठाने का एक क्रम भी तय किया गया, जिसमें आखिर में आरोपी की गैर-मौजूदगी में ट्रायल (ट्रायल इन एब्सेंटिया) भी शामिल था। ट्रायल के दौरान कामकाज के बारे में, सेशन में आरोप तय करने के लिए साठ दिन की समय-सीमा का पालन करने, सुनवाई टालने पर कानूनी सीमा, बिना रुकावट क्रॉस-एग्जामिनेशन और सबूतों के आधुनिक ढांचे का पूरा इस्तेमाल करने पर ज़ोर दिया गया। इसमें सरकारी गवाहों के ऑडियो-वीडियो बयान और तय समय में दस्तावेज़ों को स्वीकार या अस्वीकार करना भी शामिल है।
योग्य मामलों में 'प्ली बार्गेनिंग'
दस साल से ज़्यादा समय से लंबित मामलों को ज़ोन के हेड द्वारा हर महीने समीक्षा के लिए एक खास मॉनिटरिंग रजिस्टर में रखा जाएगा, और योग्य मामलों में 'प्ली बार्गेनिंग' (दोष स्वीकार कर सज़ा कम कराने की प्रक्रिया) और बिना सज़ा के ज़ब्ती पर विचार किया जाएगा। सेशन में जांच अधिकारी और पब्लिक प्रॉसिक्यूटर, दोनों स्तरों पर मुख्य जांच एजेंसी के साथ करीबी तालमेल की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया गया, क्योंकि पीएमएलए के तहत ट्रायल का नतीजा मुख्य अपराध के ट्रायल के नतीजे पर निर्भर करता है। आगे यह निर्देश दिया गया कि कुछ खास हालात को छोड़कर, पीएमएलए की धारा 44(1)(सी) के तहत कमिटल एप्लीकेशन (मामले को स्पेशल कोर्ट में भेजने की अर्ज़ी) दायर की जानी चाहिए।
सुनवाई टालने और देरी का रजिस्टर रहेगा
सम्मेलन में एक व्यवस्थित रिपोर्टिंग सिस्टम को मंज़ूरी दी गई, जिसमें स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की इलेक्ट्रॉनिक कोर्ट डायरी से लेकर स्पेशल डायरेक्टर द्वारा हर पखवाड़े समीक्षा और लाइव ट्रायल पेंडेंसी डैशबोर्ड शामिल है। हर मामले में सुनवाई टालने और देरी के कारणों का रजिस्टर भी रखा जाएगा। तय लक्ष्यों में सुनवाई टालने की घटनाओं में कमी, नब्बे प्रतिशत से ज़्यादा मामलों में समन की तामील, दस साल से ज़्यादा समय से लंबित मामलों में कमी, और आरोप तय होने से लेकर फ़ैसले तक की प्रक्रिया में तेज़ी लाना शामिल है।