मणिपुर में बीता हफ्ता बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल वाला रहा। पहले मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने इस्तीफा दिया फिर गुरुवार को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। राज्य में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा के चलते बीरेन सिंह की लगातार आलोचना हो रही थी। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में मणिपुर के इसी बदले राजनीतिक हालात पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार, राजकिशोर और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
अवधेश कुमार: एन बीरेन सिंह ने इस्तीफा चाहे दिया हो या उनसे दिलवाया गया हो। दिलवाया गया तो कुछ योजना से ही दिलवाया गया होगा। गृह मंत्रालय पास कई ऐसी जानकारियां थीं, जिसकी बड़ी भूमिका इस राजनीतिक घटनाक्रम में है। मणिपुर लंबे समय तक धू-धूकर जलता रहा है। पूरे पूर्वोत्तर से अफ्सपा को पूरी तरह से समाप्त करके बातचीत करके समधान निकालने की कोशिश हुई, लेकिन दुर्भाग्य से मणिपुर में मैतेई और कुकी की समस्या का समाधान नहीं निकल पाया। बाहर की शक्तियों ने भी इसमें आग में घी जैसा काम किया। उम्मीद है कि मणिपुर शांत हो, लेकिन ये इतना भी आसान नहीं है। मुझे लगता है कि राष्ट्रपति शासन एक कालावधि के लिए है। समस्या का समाधान निकालने के लिए यह एक सीमित समय के लिए रहेगा।
पूर्णिमा त्रिपाठी: मणिपुर का मामला पूरी तरह से गवर्नेंस फेलियर का मामला है। इतने संवेदनशील राज्य में डबल इंजन सरकार होने के बाद भी दो साल से ऊपर हो चुके हैं और वहां की स्थितियां काबू में नहीं आई हैं। भाजपा को इस मामले में बैठकर आत्मचिंतन करने की जरूरत है। यह भी सोचना होगा कि अब आगे समाधान कैसे निकाला जाएगा।
समीर चौगांवकर: केंद्र सरकार के पास राष्ट्रपति शासन लगाने के आलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। राज्य में दो ऐसी घटनाएं घटीं, जिसके बात यह तय था कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ेगा। मणिपुर के मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का जो ऑडियो आया, जिसमें वो हिंसा को लेकर कुछ कह रहे थे, उसने पार्टी को एक असहज स्थिति में ला दिया। 9 फरवरी को उन्होंने इस्तीफा दिया और 10 फरवरी को विधानसभा सत्र शुरू होने वाला था, जिसमें कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव लाने वाली थी। उससे चार दिन पहले भाजपा के 17 विधायक दिल्ली आए थे। संबित पात्रा से उनकी मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात में उन्होंने कह दिया था कि अगर बीरेन सिंह को नहीं हटाया गया तो हम अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन कर देंगे। भाजपा को लगा कि फ्लोर टेस्ट में सरकार गिरे और किरकिरी हो, उससे पहले ही इस्तीफा ले लिया गया। उनके इस्तीफे के बाद किसी के नाम पर सहमति नहीं बन पा रही थी। उसके बाद राष्ट्रपति शासन लगाना तय हुआ। मुझे लगता है कि बीरेन सिंह का इस्तीफा बहुत पहले हो जाना चाहिए था।
राजकिशोर: प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में मणिपुर की घटना एक दाग के तौर पर देखी जाएगी। वहां की भौगोलिक और सामाजिक प्ररिस्थिति को भी हमें देखना पड़ेगा। इसके साथ ही वहां की सुरक्षा की स्थिति को भी देखना पड़ेगा। दो बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां जाने का प्रयास किया, लेकिन वहां से आए इनपुट की वजह से वो वहां नहीं गए। एन बीरेन सिंह पद नहीं छोड़ने की जिद पर अड़े थे। विधानसभा सत्र से पहले जब विधायकों ने उनका साथ छोड़ दिया तब चीजें बदलीं। एन बीरेन सिंह की विफलता की कीमत भाजपा को चुकानी पड़ रही है।
अनुराग वर्मा: मणिपुर की समस्या बहुत गंभीर है। जो स्थिति बनी है वो रातोंरात नहीं बनी है। ऐसी स्थिति में विपक्ष अगर सत्तापक्ष के साथ मिलकर समस्या के समाधान की बात करता तो ज्यादा बेहतर स्थिति होती। यह अपना चेहरा बचाने और दोबारा से कानून व्यवस्था को स्थापित करने के लिए उठाया गया कदम है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।